UP Politics: उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर नए समीकरण बनने लगे हैं. मुकाबला भले ही मुख्य रूप से भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच दिखाई दे रहा हो, लेकिन मैदान में मौजूद तीसरी ताकतें कई सीटों का गणित बिगाड़ने की क्षमता रखती हैं. बसपा सुप्रीमो मायावती और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद की रणनीति पर अब राजनीतिक दलों की नजर है. एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उन विधानसभा क्षेत्रों में लगातार सक्रिय हैं, जहां 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी. दूसरी तरफ अखिलेश यादव अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने में जुटे हैं. इसी बीच मायावती और चंद्रशेखर आजाद की अलग-अलग राजनीतिक रणनीति चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना रही है.
115 सीटों पर BJP की खास नजर, योगी ने बढ़ाई सक्रियता
2027 की लड़ाई के लिए भाजपा ने अभी से अपनी जमीन मजबूत करनी शुरू कर दी है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मई से अब तक प्रदेश के 44 से अधिक जिलों का दौरा किया है. करीब 115 विधानसभा क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यास के जरिए सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाया जा रहा है. इन 115 सीटों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में इनमें से बड़ी संख्या में सीटों पर सपा-कांग्रेस गठबंधन ने बढ़त बनाई थी. ऐसे में भाजपा का फोकस अब उन क्षेत्रों पर है, जहां उसे पिछली बार झटका लगा था.
अखिलेश के PDA फॉर्मूले की भी परीक्षा
सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार PDA की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं. पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक साथ जोड़ने की रणनीति को सपा की 2027 की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है. लेकिन यहीं से सपा के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर दलित वोट का एक हिस्सा बसपा या चंद्रशेखर आजाद के साथ चला गया तो PDA का समीकरण कितना मजबूत रह पाएगा? यही वजह है कि बसपा और आजाद समाज पार्टी की गतिविधियां सपा के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी भाजपा के लिए.
मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना पुराना आधार वापस लाने की
कभी यूपी की राजनीति में बसपा का दलित वोट पर मजबूत प्रभाव माना जाता था. लेकिन पिछले कुछ चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर हुआ है. ऐसे में मायावती के सामने 2027 में सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को दोबारा सक्रिय करने की है. ताजा राजनीतिक विश्लेषणों में भी यूपी में दलित वोट को लेकर भाजपा, सपा और कांग्रेस के साथ चंद्रशेखर आजाद की बढ़ती सक्रियता का जिक्र है. यही वजह है कि दलित राजनीति अब किसी एक दल तक सीमित नहीं दिख रही. हालिया घटनाक्रम में मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद की पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर भी बदलाव किया है. इसे 2027 से पहले बसपा के संगठनात्मक पुनर्गठन के संदर्भ में देखा जा रहा है.
चंद्रशेखर आजाद ने बढ़ाई हलचल, 45 सीटों पर उतारे संभावित चेहरे
चंद्रशेखर आजाद अब सिर्फ दलित राजनीति के चेहरे के रूप में खुद को सीमित नहीं रखना चाहते. आजाद समाज पार्टी ने जुलाई में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 45 संभावित उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी. खास बात यह रही कि इस सूची में 16 OBC चेहरों को जगह दी गई. यानी पार्टी दलित आधार से आगे बढ़कर पिछड़े वर्गों में भी अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश कर रही है. चंद्रशेखर के लिए 2027 का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2024 में नगीना लोकसभा सीट जीतकर उन्होंने यूपी की मुख्यधारा की राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई. अब चुनौती इस प्रभाव को पश्चिमी यूपी से बाहर दूसरे इलाकों तक पहुंचाने की है.
क्या मायावती और चंद्रशेखर एक-दूसरे का वोट काटेंगे?
यूपी की राजनीति का सबसे बड़ा सस्पेंस यही है. अगर बसपा और आजाद समाज पार्टी अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरती हैं, तो कई सीटों पर दलित मतों का विभाजन हो सकता है. इसका असर सिर्फ बसपा पर नहीं पड़ेगा. दलित वोट का बंटवारा सपा के PDA समीकरण को भी प्रभावित कर सकता है. वहीं यदि मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय हुआ तो कम अंतर वाली सीटों पर भाजपा को भी रणनीतिक फायदा मिल सकता है. हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि किस दल को कितना फायदा या नुकसान होगा. चुनाव तक सामाजिक और राजनीतिक समीकरण कई बार बदल सकते हैं.
पश्चिमी यूपी में चंद्रशेखर की सबसे बड़ी परीक्षा
चंद्रशेखर आजाद का सबसे मजबूत राजनीतिक प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिखाई देता है. ऐसे में 2027 में मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, सहारनपुर, बुलंदशहर और आसपास के इलाकों में उनकी पार्टी की सक्रियता पर विशेष नजर रहेगी. 45 संभावित उम्मीदवारों की सूची में पश्चिमी यूपी के साथ लखनऊ और अलीगढ़ जैसे क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है. इससे संकेत मिलता है कि पार्टी अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहती है.
BJP के लिए भी बन सकता है फायदा और चुनौती दोनों
तीसरी ताकतों की मौजूदगी भाजपा के लिए दोधारी तलवार जैसी हो सकती है. यदि विपक्षी वोटों का बंटवारा होता है तो कई सीटों पर भाजपा को फायदा मिल सकता है. लेकिन यदि चंद्रशेखर आजाद अपनी पार्टी को व्यापक सामाजिक आधार देने में सफल रहे और किसी बड़े चुनावी समीकरण का हिस्सा बने, तो मुकाबला भाजपा के लिए भी कठिन हो सकता है. भाजपा ने भी 2027 के लिए अपनी रणनीति पर काम तेज कर दिया है. पार्टी के यूपी प्रभारी विनोद तावड़े के हालिया दौरे और संगठनात्मक गतिविधियों से साफ है कि भाजपा अब चुनावी मोड में तेजी से आगे बढ़ रही है.
असली सवाल- 2027 में कौन किसका खेल बिगाड़ेगा?
यूपी की 403 विधानसभा सीटों की लड़ाई में अभी कई महीने बाकी हैं, लेकिन राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछ चुकी है. एक तरफ योगी आदित्यनाथ की BJP, दूसरी तरफ अखिलेश यादव की SP, और इनके बीच अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुटी मायावती की BSP और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी है. सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन कितनी सीटें जीतेगा. सवाल यह है कि कौन किसका वोट काटेगा और किसके वोटों का बंटवारा किसे सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाएगा? अगर मायावती बसपा का पुराना दलित आधार वापस खींचने में सफल होती हैं और चंद्रशेखर आजाद युवाओं, दलितों और OBC मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बढ़ाते हैं, तो 2027 का चुनाव BJP बनाम SP की सीधी लड़ाई नहीं रह जाएगा.
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