UP Panchayat News: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है. मई 2026 में ग्राम प्रधानों का 5 साल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद राज्य सरकार ने उन्हें 6 महीने (नवंबर 2026 तक) के लिए प्रशासक के रूप में नियुक्त किया था. हालांकि, अब यह कयास लगाए जा रहे हैं कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक के तौर पर 6 महीने का एक और सेवा विस्तार दिया जा सकता है.आयोग ग्रामीण स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्ग की आबादी, सामाजिक स्थिति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन करेगा. इसके लिए जिलों से विस्तृत जानकारी जुटाई जा रही है. आयोग की रिपोर्ट के आधार पर सरकार पंचायतों में OBC आरक्षण को लेकर आगे की प्रक्रिया तय करेगी. इसके बाद आरक्षण की सूची जारी होने का रास्ता साफ होगा.
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट
पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का सटीक आरक्षण तय करने के लिए राज्य सरकार ने समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया है. आयोग प्रदेश के सभी 75 जिलों से ग्राम पंचायतवार 14 बिंदुओं पर आंकड़े जुटा रहा है. आयोग द्वारा अपनी विस्तृत रिपोर्ट नवंबर या दिसंबर तक सौंपने की संभावना है. 14 बिंदुओं पर मांगी गई रिपोर्ट में ग्राम पंचायत की कुल आबादी के साथ OBC, SC और ST आबादी का विवरण, OBC आबादी का प्रतिशत, पंचायत में वार्डों की संख्या और पहले लागू रहे आरक्षण की स्थिति जैसी जानकारियां शामिल हैं. इन आंकड़ों के आधार पर पंचायतवार आरक्षण का नया प्रारूप तैयार किया जाएगा। सभी जिलों से रिपोर्ट मिलने के बाद शासन स्तर से आरक्षण की अंतिम सूची जारी की जाएगी, जिसके बाद आपत्तियां ली जाएंगी और उनका निस्तारण किया जाएगा.
आरक्षण सूची और आपत्तियां
आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही शासन द्वारा सीटों के आरक्षण की अंतिम सूची जारी की जाएगी, जिस पर आपत्तियां मांगी जाएंगी और उनका निस्तारण किया जाएगा. इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में समय लगना तय है.
हाईकोर्ट का रुख
इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने संबंधी सरकारी आदेशों पर सवाल उठा चुका है और इसे कानूनी व संवैधानिक दायरे में स्पष्ट करने के निर्देश दे चुका है.
चुनाव टलने के मुख्य कारण
आरक्षण रिपोर्ट के निस्तारण और अंतिम मतदाता सूची/अधिसूचना जारी होने में 2026 के अंत तक का समय बीत जाएगा.प्रशासक के रूप में ग्राम प्रधान केवल दैनिक व प्रशासनिक कार्य ही संभाल सकते हैं. किसी भी बड़े नीतिगत या वित्तीय फैसले के लिए जिलाधिकारी (DM) की मंजूरी अनिवार्य रखी गई है.
अनुपातिक आरक्षण का निर्धारण
आयोग द्वारा जुटाई गई रिपोर्ट और सिफारिशों के आधार पर प्रत्येक स्थानीय निकाय/पंचायत स्तर पर आवश्यकतानुसार आरक्षण का अनुपात तय किया जाएगा.
50% की सीमा का पालन
अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और ओबीसी के लिए मिलाकर कुल आरक्षण किसी भी स्थिति में 50 प्रतिशत की कुल सीमा से अधिक नहीं हो सकता.
आरक्षण तय करने की प्रक्रिया
समर्पित आयोग प्रत्येक ग्राम पंचायत से ओबीसी आबादी, उनकी आर्थिक/सामाजिक स्थिति और इससे पूर्व के चुनावों में उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व का डेटा इकट्ठा करता है. सर्वेक्षण पूरा होने के बाद आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगा.
आरक्षण सूची और आपत्तियां
शासन द्वारा इस रिपोर्ट के आधार पर पंचायतवार आरक्षण की अनंतिम (ड्राफ्ट) सूची जारी की जाएगी, जिस पर आम जनता से आपत्तियां मांगी जाएंगी। आपत्तियों के कानूनी निस्तारण के बाद ही अंतिम आरक्षण सूची जारी होगी, जिसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव की तिथियों की घोषणा कर सकेगा.
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