आंखें बंद होने के बाद भी रोशनी का सफर! जानें, 1500+ नेत्रहीनों की दुनिया रोशन करने वाले 'भगीरथ' डॉ. एसपी सिंह की कहानी

UP News: प्रयागराज के डॉ. एसपी सिंह ने कॉर्निया प्रत्यारोपण के ज़रिए 1500 से अधिक नेत्रहीनों के जीवन में प्रकाश फैलाया है. उनकी विशेषज्ञता और नेत्रदान के प्रति जागरूकता ने अनगिनत लोगों को देखने की क्षमता वापस दिलाई है. यह लेख उनके प्रेरणादायक कार्य और नेत्रदान के महत्व पर प्रकाश डालता है.

UP News: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित मनोहर दास नेत्र चिकित्सालय के नेत्र सर्जन डॉ. एसपी सिंह ने करीब तीन दशक के अपने चिकित्सा करियर में 1500 से अधिक नेत्रहीनों की जिंदगी में रोशनी पहुंचाई है. कॉर्निया प्रत्यारोपण के जरिए उन्होंने ऐसे लोगों को दुनिया देखने का मौका दिया, जिनकी आंखों की रोशनी चली गई थी. उनका कहना है कि नेत्रदान केवल पुण्य का काम नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद समय पर पूरी की जाने वाली एक महत्वपूर्ण चिकित्सा प्रक्रिया है.

एक छोटी चूक और रुक जाती है रोशनी

कई लोग जीवन रहते नेत्रदान का संकल्प लेते हैं और प्लेज कार्ड भी भरते हैं. लेकिन मृत्यु के बाद सूचना देने में देरी, परिवार की असमंजस की स्थिति या रिश्तेदारों की भ्रांतियों के कारण नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती. डॉ. एसपी सिंह के मुताबिक, सबसे बड़ी चुनौती लोगों को नेत्रदान के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद समय पर प्रक्रिया शुरू कराना है.

कॉर्निया से बदल रही लोगों की दुनिया

मनोहर दास नेत्र चिकित्सालय के नेत्र बैंक के माध्यम से डॉ. एसपी सिंह ने 1500 से अधिक लोगों को रोशनी देने में योगदान दिया है. प्रयागराज के अलावा कौशांबी, फतेहपुर, प्रतापगढ़, चित्रकूट और रीवा के कई लोग कॉर्निया प्रत्यारोपण के बाद दुनिया देख पा रहे हैं. डॉ. सिंह बताते हैं कि कई मामलों में नेत्रदान और कॉर्निया प्रत्यारोपण आसानी से हो जाता है, जबकि कुछ मामलों में प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण रहती है.

220 लोगों को अब भी रोशनी का इंतजार

मनोहर दास नेत्र चिकित्सालय के नेत्र बैंक में 220 जरूरतमंद लोगों का पंजीकरण है, जिन्हें कॉर्निया प्रत्यारोपण की उम्मीद है. बीते तीन वर्षों में 1460 लोगों ने नेत्रदान का संकल्प पत्र जमा किया है. इनमें 2024-25 में 520, 2025-26 में 460 और 2026 में अब तक 480 लोगों ने प्लेज कार्ड भरा है.

हर साल दर्जनों लोगों को मिल रही नई रोशनी

डॉ. एसपी सिंह ने 2012-13 से अब तक 664 लोगों की आंखों में कॉर्निया प्रत्यारोपण किया है. आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में 40, 2025-26 में 45 और 2026 में अब तक 40 दृष्टिहीनों को कॉर्निया प्रत्यारोपण से रोशनी मिली है. मूल रूप से फतेहपुर के रहने वाले डॉ. सिंह ने मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और एमएस किया है. वह इसी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य भी रह चुके हैं. उन्होंने 12 घंटे में 250 मरीजों की आंखों का ऑपरेशन करने का रिकॉर्ड भी दर्ज है. वर्ष 2002 में उन्होंने 89 मरीजों की आंखों का ऑपरेशन किया था, जिसके लिए उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ था.

रिश्तेदारों की झिझक बनती है बड़ी बाधा

डॉ. सिंह के मुताबिक, परिवार में किसी की मृत्यु के बाद परिजन मानसिक तनाव में होते हैं. ऐसे समय में कई बार रिश्तेदारों की बातों या भ्रांतियों के कारण नेत्रदान का संकल्प पूरा नहीं हो पाता. उनका कहना है कि लोगों को जीवन रहते अपने परिवार को नेत्रदान के फैसले की जानकारी देनी चाहिए, ताकि मृत्यु के बाद समय पर नेत्र बैंक को सूचना दी जा सके और कॉर्निया जरूरतमंद तक पहुंच सके.

नेत्रदान से मृत्यु के बाद भी मिलता है उजाला

डॉ. एसपी सिंह का कहना है कि शरीर मृत्यु के बाद पंचतत्व में विलीन हो जाता है, लेकिन नेत्रदान के जरिए किसी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी में रोशनी लौटाई जा सकती है. इसलिए लोगों को नेत्रदान के प्रति जागरूक होना चाहिए और अपने परिवार को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए.

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By खुशबू कुमारी

खुशबू कुमारी पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर में डिजिटल कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्होंने पटना विमेंस कॉलेज, से मास कम्युनिकेशन में स्नातक किया है तथा वर्तमान में इग्नू से मास्टर ऑफ आर्ट्स (मास कम्युनिकेशन एंड डिजिटल मीडिया) की पढ़ाई कर रही हैं. उन्हें जनहित से जुड़ी खबरों, डिजिटल पत्रकारिता, समाचार लेखन, फोटोग्राफी, वीडियो एडिटिंग और ग्राफिक डिजाइन में विशेष रुचि है. वे राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, अपराध और जनसरोकार से जुड़े विषयों पर शोधपरक, तथ्यपरक और पाठकों के लिए उपयोगी डिजिटल कंटेंट तैयार करती हैं. उनका उद्देश्य पाठकों तक विश्वसनीय, स्पष्ट और प्रभावी जानकारी पहुंचाना है, ताकि समाचार केवल सूचना का माध्यम न होकर समाज के लिए उपयोगी साबित हों.

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