UP Teacher Recruitment : उत्तर प्रदेश में 69 हजार शिक्षक भर्ती का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक दौर में पहुंच गया है. मामले में 22 सितंबर को अहम सुनवाई होगी. इस दौरान मेधावी एससी-ओबीसी अभ्यर्थियों को अनारक्षित सीटों पर माइग्रेशन का लाभ देने और करीब छह वर्षों से नौकरी कर रहे 67,867 शिक्षकों की नियुक्ति बचाने के बीच समाधान निकालने पर विचार हो सकता है.
67,867 शिक्षकों की नियुक्ति का मामला
एक जून 2020 को 69 हजार पदों के लिए 67,867 अभ्यर्थियों की चयन सूची जारी की गई थी. एसटी वर्ग के 1,133 पद योग्य अभ्यर्थी नहीं मिलने के कारण खाली रह गए थे. विवाद के बीच आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने सामान्य और ओबीसी कटऑफ के बीच महज 0.38 अंक के अंतर को आधार बनाते हुए आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाए. उनका आरोप है कि मेधावी एससी-ओबीसी अभ्यर्थियों को अनारक्षित सीटों पर माइग्रेशन का लाभ नहीं दिया गया. इससे करीब 19 हजार सीटों पर आरक्षण नियमों के उल्लंघन का दावा किया गया.
क्या है माइग्रेशन का विवाद?
आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि एससी या ओबीसी वर्ग का कोई अभ्यर्थी सामान्य मेरिट में आता है, तो उसे अनारक्षित सीट दी जानी चाहिए. इससे उसकी आरक्षित सीट दूसरे पात्र अभ्यर्थी के लिए उपलब्ध हो सकती है. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने 29 मई 2021 की रिपोर्ट में भी इस मामले में आरक्षण से जुड़ी विसंगतियों का उल्लेख किया था. रिपोर्ट के मुताबिक, ओबीसी को निर्धारित 27 प्रतिशत के बजाय 3.86 प्रतिशत और एससी वर्ग को 21 प्रतिशत के बजाय 16.2 प्रतिशत आरक्षण मिलने की बात कही गई थी.
6800 अभ्यर्थियों की अतिरिक्त सूची भी बनी थी विवाद का कारण
प्रदेश सरकार ने 5 जनवरी 2022 को 6,800 अभ्यर्थियों की अतिरिक्त चयन सूची जारी की थी. हालांकि, बाद में हाई कोर्ट ने इस सूची को रद्द कर दिया. अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कार्यरत शिक्षकों की नियुक्ति का मुद्दा भी अहम रहेगा. 16 सितंबर को हुई सुनवाई में कार्यरत शिक्षकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि चयनित शिक्षक करीब छह वर्षों से सेवा दे रहे हैं.
सरकार ने नियुक्तियां सुरक्षित रखने का दिया प्रस्ताव
प्रदेश सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि करीब छह वर्षों से कार्यरत शिक्षकों को हटाने के बजाय उनकी नियुक्तियां सुरक्षित रखी जानी चाहिए. सरकार ने प्रस्ताव रखा है कि कार्यरत शिक्षकों को हटाए बिना आरक्षण से प्रभावित नए पात्र अभ्यर्थियों को रिक्त पदों पर समायोजित किया जा सकता है. वहीं, आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी भी विवाद का समाधान चाहते हैं. उनका कहना है कि मौजूदा शिक्षकों को हटाए बिना नए पात्र अभ्यर्थियों को समायोजित करके मामले का समाधान किया जा सकता है.
टीईटी में मिली छूट को लेकर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान यह सवाल भी सामने आया कि टीईटी में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को मिली छूट को अंतिम भर्ती में आरक्षण का दोहरा लाभ कैसे माना जा सकता है. दूसरी ओर, जिन आरक्षित अभ्यर्थियों ने आयु, शुल्क या अन्य रियायत का लाभ लिया है, उनके बाद में अनारक्षित सीट पर माइग्रेशन को लेकर भी सवाल उठाया गया है.
22 सितंबर की सुनवाई पर टिकी नजर
हाई कोर्ट के आदेश के लागू होने की स्थिति में करीब 10 हजार शिक्षकों के प्रभावित होने की आशंका जताई गई है. ऐसे में 22 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई को इस पूरे विवाद के लिए अहम माना जा रहा है. अब नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट कार्यरत शिक्षकों की नियुक्ति और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के दावों के बीच किस तरह का समाधान निकालता है. अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट ही करेगा.
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