UP Politics: फेफना की सियासी जमीन पर इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम विपक्ष का नहीं दिख रहा है. कमल के खेमे में ही तीन ऐसे चेहरे चर्चा में हैं, जिनकी अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत और पहचान है. पूर्व मंत्री उपेंद्र तिवारी, सपा के पूर्व मंत्री और अब भाजपा नेता नारद राय तथा पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पुत्रवधू सुषमा शेखर की सक्रियता ने फेफना की राजनीति में टिकट की संभावित दौड़ को बेहद दिलचस्प बना दिया है.सियासी सवाल सीधा है—अगर भाजपा फेफना से इन तीन चेहरों में से किसी एक पर दांव लगाती है, तो बाजी किसके हाथ लगेगी?
दो बार जीत का अनुभव बनाम नए सियासी समीकरण
उपेंद्र तिवारी के पास सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है—फेफना से लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड. 2012 और 2017 में उन्होंने इस सीट पर जीत दर्ज की. 2017 के बाद प्रदेश सरकार में मंत्री बने और क्षेत्र की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई. लेकिन 2022 का चुनाव उनके लिए झटका लेकर आया. हार के बाद भी फेफना की राजनीति से उनकी पकड़ पूरी तरह खत्म नहीं हुई. यही वजह है कि टिकट की चर्चा में उनका नाम आज भी मजबूती से लिया जाता है. उनके सामने चुनौती यह है कि पार्टी अब भविष्य की राजनीति के लिए किस चेहरे को अधिक प्रभावी मानती है.
नारद राय की एंट्री ने बदला गणित
नारद राय की भाजपा में एंट्री ने फेफना की सियासत में नया कोण जोड़ दिया है. लंबे समय तक सपा की राजनीति करने वाले और प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके नारद राय अब भाजपा के पाले में हैं. उनके पास चुनावी राजनीति का लंबा अनुभव है. बलिया की राजनीति में व्यक्तिगत संपर्क और अपनी राजनीतिक पहचान भी है. ऐसे में उनकी दावेदारी को केवल पार्टी में नये आने वाले नेता की दावेदारी मानना आसान नहीं होगा. नारद राय का सवाल भी साफ है—क्या भाजपा उनके राजनीतिक अनुभव और प्रभाव को फेफना में आजमायेगी?
सुषमा शेखर के नाम से जुड़ा है चंद्रशेखर परिवार का प्रभाव
तीसरा नाम सुषमा शेखर का है. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पुत्रवधू होने के कारण उनका नाम बलिया की राजनीति में सामान्य राजनीतिक दावेदारी से अलग महत्व रखता है. चंद्रशेखर की राजनीतिक विरासत बलिया से गहराई से जुड़ी रही है. ऐसे में सुषमा शेखर की सक्रियता को भी सियासी नजरिये से देखा जा रहा है. उनकी दावेदारी अगर आगे बढ़ती है तो भाजपा के सामने एक ऐसा विकल्प होगा, जिसके साथ राजनीतिक विरासत और परिवार की पहचान जुड़ी है.
एक सीट, तीन राजनीतिक कहानियां
फेफना में इन तीन चेहरों को देखें तो भाजपा के सामने तीन अलग-अलग विकल्प दिखाई देते हैं.
उपेंद्र तिवारी—दो बार के विधायक और पूर्व मंत्री.
नारद राय—लंबे राजनीतिक अनुभव वाले पूर्व मंत्री और हाल में भाजपा में आये प्रमुख नेता.
सुषमा शेखर—पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पुत्रवधू और राजनीतिक विरासत से जुड़ा चेहरा.
यानी भाजपा के सामने चुनावी टिकट का फैसला सिर्फ व्यक्ति का चयन नहीं होगा. इसके साथ स्थानीय पकड़, संगठन, जातीय-सामाजिक समीकरण, व्यक्तिगत जनाधार और पार्टी की भविष्य की रणनीति भी जुड़ी होगी.
असली खेल यहीं से शुरू होता है
राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि कौन टिकट मांग रहा है, बल्कि यह होता है कि किसकी दावेदारी पार्टी के लिए चुनाव जीतने का सबसे मजबूत रास्ता बनती है. उपेंद्र तिवारी के पास पुराना संगठनात्मक आधार और दो चुनाव जीतने का अनुभव है. नारद राय के पास लंबा राजनीतिक अनुभव और अपना जनसंपर्क है. सुषमा शेखर के साथ चंद्रशेखर परिवार की विरासत जुड़ी है. ऐसे में आने वाले समय में फेफना में भाजपा के भीतर गतिविधियां बढ़ना स्वाभाविक है.
2022 की हार का हिसाब भी होगा अहम
फेफना की राजनीति में 2022 का परिणाम भी इस पूरे समीकरण की कुंजी बन सकता है. उपेंद्र तिवारी की हार के बाद पार्टी के सामने यह सवाल जरूर रहा होगा कि आखिर किन कारणों से सीट हाथ से निकली और अगले चुनाव में उसे कैसे वापस हासिल किया जाए. अगर पार्टी पुराने चेहरे पर भरोसा करती है तो उसके सामने 2022 की हार के कारणों को दूर करने की चुनौती होगी. अगर नारद राय को मौका मिलता है तो उन्हें भाजपा संगठन और अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव के बीच बेहतर तालमेल बैठाना होगा. और अगर सुषमा शेखर का नाम आगे आता है तो चंद्रशेखर परिवार की विरासत को चुनावी राजनीति में किस तरह वोट में बदला जाता है, यह सबसे बड़ा सवाल होगा.
फेफना में अभी से शुरू हो गया ‘कौन बनेगा चेहरा’ का खेल
फिलहाल भाजपा ने किसी को प्रत्याशी घोषित नहीं किया है. इसलिए किसी एक नाम को आगे मान लेना जल्दबाजी होगी. लेकिन राजनीतिक सक्रियता और दावेदारी की चर्चा ने फेफना को भाजपा के लिए खासा महत्वपूर्ण बना दिया है. एक तरफ दो बार का विजेता, दूसरी तरफ सियासत का अनुभवी दिग्गज और तीसरी तरफ राजनीतिक विरासत वाला चेहरा. यही वजह है कि फेफना में इस बार असली मुकाबला चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद नहीं, बल्कि उससे काफी पहले भाजपा के टिकट के लिए शुरू होती राजनीतिक कवायद में दिखाई दे सकता है. अब निगाहें भाजपा नेतृत्व पर हैं.
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