UP News: रसड़ा के लोगों की उम्मीदों को बड़ा झटका उस समय लगा, जब बसपा के कद्दावर नेता और विधायक उमाशंकर सिंह का निधन हो गया. उनके साथ ही एक ऐसा सपना भी अधूरा रह गया, जिसका इंतजार हजारों किसान और मजदूर वर्षों से कर रहे थे. यह सपना था वर्षों से बंद पड़ी रसड़ा चीनी मिल को दोबारा चालू कराने का.
चुनावी वादे से लेकर विधानसभा तक उठाई आवाज
उमाशंकर सिंह ने विधानसभा चुनाव के दौरान जनता से वादा किया था कि यदि उन्हें अवसर मिला तो रसड़ा चीनी मिल को फिर से चालू कराने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे. विधायक बनने के बाद उन्होंने विभिन्न मंचों पर इस मुद्दे को उठाया और सरकार से मिल को पुनर्जीवित करने की मांग भी की.
किसानों की अर्थव्यवस्था से जुड़ा है चीनी मिल का सवाल
रसड़ा चीनी मिल बंद होने के बाद सबसे अधिक असर गन्ना किसानों पर पड़ा. किसानों को अपनी फसल दूर-दराज की चीनी मिलों तक ले जानी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ती है और मुनाफा घट जाता है. स्थानीय लोगों का मानना था कि यदि मिल दोबारा शुरू होती तो किसानों की आय बढ़ने के साथ हजारों युवाओं को रोजगार भी मिलता.
जनता को थी मजबूत पैरवी की उम्मीद
क्षेत्र के लोगों को भरोसा था कि अपने राजनीतिक अनुभव और सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से बात रखने की क्षमता के दम पर उमाशंकर सिंह इस लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करा देंगे. यही वजह थी कि रसड़ा चीनी मिल का मुद्दा उनकी पहचान से भी जुड़ गया था.
अब अधूरे वादे को पूरा कौन करेगा?
उमाशंकर सिंह के निधन के बाद एक बार फिर रसड़ा चीनी मिल का मुद्दा चर्चा में है. किसान, व्यापारी और स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर अब इस अधूरे सपने को कौन पूरा करेगा. लोगों की उम्मीदें अब नए जनप्रतिनिधि और सरकार पर टिकी हैं.
संघर्ष रहेगा याद
उमाशंकर सिंह अब भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन क्षेत्र के विकास और रसड़ा चीनी मिल को फिर से चालू कराने के लिए उनका संघर्ष लंबे समय तक याद किया जाएगा. उनका सपना अधूरा जरूर रह गया, लेकिन यह मुद्दा आज भी रसड़ा की जनता के लिए उतना ही बड़ा है, जितना वर्षों पहले था.
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