UP Crime News: उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में हुए कथित पुलिस एनकाउंटर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने गंभीर सवाल उठाए हैं. कोर्ट को पुलिस की एफआईआर में कई विरोधाभास मिले हैं. अदालत ने मामले की निष्पक्ष जांच के लिए इसकी जिम्मेदारी केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है. साथ ही, आरोपी के खिलाफ चल रही अदालती कार्यवाही पर भी रोक लगा दी गई है.
पुलिस की कहानी में कहां फंसा पेंच?
यह मामला आरोपी छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन से जुड़ा है. जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने उसकी याचिका पर सुनवाई के दौरान पुलिस के एनकाउंटर के दावे पर सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में कई बातें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं. अदालत के मुताबिक, संबंधित थानाध्यक्ष ने घटना का जो विवरण पेश किया है, वह प्रथम दृष्टया संदिग्ध नजर आता है. ऐसे में मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है.
9 मई को बच्चे के अपहरण का केस दर्ज
एफआईआर के अनुसार, 9 मई 2025 को अलाउद्दीन के खिलाफ सात वर्षीय बच्चे के अपहरण के आरोप में इकौना थाने में केस दर्ज हुआ था. इसके तीन दिन बाद, 12 मई को तत्कालीन एसएचओ अश्विनी कुमार दुबे ने एक और एफआईआर दर्ज कराई. इसमें दावा किया गया कि अलाउद्दीन नेपाल भागने की कोशिश कर रहा था. पुलिस के मुताबिक, उसे रोकने के दौरान उसने फायरिंग की. जवाबी कार्रवाई में एसएचओ ने आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं. दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगीं.
15 मीटर दूर से अंधेरे में दोनों पैरों पर लगीं गोलियां
पुलिस की कहानी का यह हिस्सा हाईकोर्ट के सवालों के घेरे में आ गया. एसएचओ का दावा था कि रात के अंधेरे में उन्होंने करीब 15 मीटर की दूरी से फायर किया. उनके मुताबिक, उन्हें केवल हथियार लोड होने की आवाज सुनाई दी थी. इसके बाद उन्होंने अपनी 9 एमएम सर्विस पिस्टल से फायर किया. दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगीं. कोर्ट ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए CBI को एसएचओ की निशानेबाजी क्षमता की भी जांच करने का निर्देश दिया है.
23 पुलिसकर्मी मौजूद थे, फिर भी किसी को गोली नहीं लगी
हाईकोर्ट ने एनकाउंटर की परिस्थितियों पर भी सवाल उठाया. अदालत ने गौर किया कि आरोपी जिस वाहन में था, उसके आसपास 23 पुलिसकर्मी मौजूद थे. पुलिस के अनुसार, आरोपी ने फायरिंग की. इसके बावजूद एक भी पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ. दूसरी ओर, अंधेरे में करीब 15 मीटर की दूरी से चली दोनों गोलियां सीधे आरोपी के दोनों पैरों में लगीं. कोर्ट ने इसी विरोधाभास को जांच का अहम बिंदु माना है.
गोली और चोट के विवरण में भी अंतर
अदालत ने 9 एमएम गोली के आकार और आरोपी के पैरों में मिले घावों के विवरण में भी अंतर नोट किया है. कोर्ट के सामने यह सवाल भी उठा कि पुलिस की बताई गई फायरिंग और चोटों का विवरण आपस में कितना मेल खाता है. इन्हीं सवालों के चलते हाईकोर्ट ने पूरे मामले की जांच CBI को सौंपने का फैसला किया.
एनकाउंटर के बाद 23 पुलिसकर्मियों को मिला था 'गुड वर्क'
मामले में एक और अहम तथ्य सामने आया. कथित एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को तुरंत 'गुड वर्क' के नाम पर पुरस्कृत किया गया था. अब हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले की जांच CBI से कराने का आदेश दिया है. एजेंसी को तीन महीने के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट अदालत में दाखिल करनी होगी.
आरोपी के खिलाफ कार्रवाई पर भी रोक
हाईकोर्ट ने श्रावस्ती की सत्र अदालत में अलाउद्दीन के खिलाफ चल रही न्यायिक कार्यवाही पर भी रोक लगा दी है. मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी. अब CBI की जांच से यह स्पष्ट होगा कि एनकाउंटर को लेकर उठे सवालों की वास्तविकता क्या है और पुलिस के दावों की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं.
