UP Historical Political Story: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 1979 का दौर जनता पार्टी के लिए बड़े आंतरिक संघर्ष का समय था. इमरजेंसी के बाद कांग्रेस को हराकर जनता पार्टी सत्ता में आई और यूपी की 425 सदस्यीय विधानसभा में उसे 351 सीटें मिलीं. विधायकों ने राम नरेश यादव को नेता चुना. 23 जून 1977 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उनकी सरकार में अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के नेता शामिल थे, जिनके बीच मतभेद आगे चलकर सरकार के लिए चुनौती बन गए.
RSS से जुड़ाव पर उठने लगी थी दोहरी सदस्यता का सवाल
जनता पार्टी कई दलों और राजनीतिक विचारधाराओं के एक साथ आने से बनी थी. इसमें समाजवादी नेताओं के साथ कांग्रेस से अलग हुए नेता और भारतीय जनसंघ की पृष्ठभूमि वाले लोग भी शामिल थे. जनसंघ से जुड़े नेताओं के RSS से संबंध होने के कारण पार्टी के भीतर दोहरी सदस्यता का सवाल उठने लगा. विवाद यह था कि जनता पार्टी का सदस्य रहते हुए कोई नेता RSS से जुड़ा रह सकता है या नहीं. धीरे-धीरे यह मुद्दा राजनीतिक टकराव बन गया.
कैबिनेट से जनसंघ पृष्ठभूमि वाले नेताओं ने बनाई दूरी
1979 की शुरुआत तक जनता पार्टी के भीतर RSS से जुड़े नेताओं और दूसरे धड़ों के बीच मतभेद गहरे हो चुके थे. 11 फरवरी 1979 को भारतीय जनसंघ की पृष्ठभूमि वाले जनता पार्टी के कई सदस्य राम नरेश यादव की कैबिनेट से बाहर हो गए. इससे सरकार की स्थिति कमजोर हुई और बहुमत को लेकर सवाल खड़े होने लगे. दोहरी सदस्यता का विवाद अब उत्तर प्रदेश की सरकार के अस्तित्व के लिए भी बड़ी चुनौती बन चुका था.
RSS शाखाओं को लेकर सरकार ने जारी किया आदेश
इस राजनीतिक संकट के बीच 14 फरवरी 1979 को राम नरेश यादव सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर RSS की शाखाएं आयोजित करने को लेकर अनुमति संबंधी आदेश जारी किया. इस फैसले ने जनता पार्टी के भीतर चल रहे विवाद को और हवा दे दी. RSS को लेकर असहमत नेताओं के बीच तनाव बढ़ गया. सरकार के इस कदम को राजनीतिक खींचतान का महत्वपूर्ण मोड़ माना गया, क्योंकि इसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री के समर्थन पर फैसला होना था.
अगले ही दिन विधायक दल की बैठक में बदल गया समीकरण
14 फरवरी को आदेश जारी होने के अगले दिन, 15 फरवरी 1979 को जनता पार्टी विधायक दल की बैठक हुई. इस बैठक में राम नरेश यादव को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका और उनकी सरकार का बहुमत संकट में पड़ गया. इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि नए मुख्यमंत्री के शपथ लेने तक वह कार्यवाहक मुख्यमंत्री रहे. इस घटनाक्रम ने जनता पार्टी के भीतर चल रहे गहरे राजनीतिक मतभेदों को सामने ला दिया.
इस्तीफे के बाद बनारसी दास ने संभाली सत्ता
राम नरेश यादव के इस्तीफे के बाद जनता पार्टी ने बनारसी दास को नया नेता चुना और 28 फरवरी 1979 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यादव का कार्यकाल 23 जून 1977 से 28 फरवरी 1979 तक रहा. इस घटनाक्रम को केवल एक आदेश से सरकार गिरने की कहानी मानना पूरी तस्वीर नहीं बताता. RSS की दोहरी सदस्यता का विवाद और जनता पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रही खींचतान इसके महत्वपूर्ण कारण थे.
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