UP News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत 1059 सहायक अध्यापकों की प्रथम वार्षिक वेतनवृद्धि से जुड़े एक अहम विवाद में राज्य सरकार को पुनर्विचार का स्पष्ट निर्देश जारी किया है. अदालत ने अपने फैसले में यह साफ कर दिया है कि किसी भी कर्मचारी का कार्यभार ग्रहण करना यदि किसी सार्वजनिक अवकाश की वजह से टलता है, तो इससे उसके सेवा संबंधी कानूनी अधिकारों अथवा वित्तीय लाभों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडना चाहिए.
कार्यभार ग्रहण और छुट्टी का विवाद
याचिकाकर्ता शिक्षकों की मूल नियुक्ति 28 जून 2016 को हुई थी, परंतु 1 जुलाई को रमजान का अंतिम शुक्रवार होने के कारण सार्वजनिक अवकाश घोषित था. इस वजह से शिक्षक उस दिन योगदान न देकर अगले कार्यदिवस 2 जुलाई को ही विद्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सके. विभाग ने 2 जुलाई को आधार मानकर उनकी वेतनवृद्धि को एक वर्ष के लिए टाल दिया, जिसका विरोध करते हुए अध्यापकों ने हाई कोर्ट में याचिकाएं दाखिल करके अपने उचित अधिकार की मांग उठाई.
शासनादेश और पूर्व नियमों का हवाला
शिक्षकों ने अपनी दलीलों में राज्य सरकार द्वारा 22 दिसंबर 2016 तथा 2009 में जारी विभिन्न शासनादेशों का विशेष रूप से उल्लेख किया. इन नियमों के अनुसार यदि सार्वजनिक अवकाश के कारण कार्यभार अगले कार्यदिवस पर ग्रहण किया जाता है, तो उसे कर्मचारी के हितों के विपरीत नहीं माना जाना चाहिए. अध्यापकों का स्पष्ट तर्क था कि नियुक्ति तिथि 28 जून होने के कारण उन्हें 1 जनवरी 2017 से ही पहली वेतनवृद्धि का लाभ मिलना चाहिए था, जिसे विभाग ने गलत तरीके से रोका.
अदालत की टिप्पणी और सेवा अधिकार
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने शिक्षकों की याचिकाओं का निस्तारण करते हुए संबंधित सक्षम अधिकारियों को 6 सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत अभ्यावेदनों पर तर्कसंगत आदेश पारित करने को कहा है. अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि 1 दिन की यह देरी पूरी तरह से सरकारी छुट्टी की वजह से हुई थी, जो शिक्षकों के नियंत्रण से बाहर थी. वेतनवृद्धि कोई विवेकाधीन कृपा नहीं, बल्कि सेवा नियमावली द्वारा संरक्षित प्रत्येक कर्मचारी का एक वैध अधिकार है.
