UP की इस नदी के किनारे छिपे हैं "महाभारत काल" के निशान, जहां आज भी सुनाई देती हैं "पांडवों" की गूंज

हस्तिनापुर की बूढ़ी गंगा महाभारत काल की कई स्मृतियों को संजोए हुए है. यह वही धारा है जिसने पांडवों और कौरवों के युग को देखा. इसके किनारे बसे मंदिर और घाट आज भी इतिहास की गवाही देते हैं.

UP News: मेरठ से करीब 45 किलोमीटर दूर बसा हस्तिनापुर महाभारत काल की यादों को अपने भीतर समेटे हुए है. यहां आने वाले ज्यादातर लोग पांडवों और कौरवों की राजधानी के बारे में जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इस ऐतिहासिक नगरी से होकर गुजरने वाली बूढ़ी गंगा भी इस पूरे इतिहास का अहम हिस्सा मानी जाती है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह वही पुरानी धारा है जिसने महाभारत काल की कई घटनाओं को देखा. आज भी इसके किनारे मौजूद मंदिर और घाट उस दौर की याद दिलाते हैं.

हस्तिनापुर और बूढ़ी गंगा का ऐतिहासिक संबंध

हस्तिनापुर को कभी कुरु वंश की राजधानी माना जाता था. कहा जाता है कि यहीं राजा शांतनु, भीष्म पितामह, धृतराष्ट्र, कौरव और पांडव रहते थे. शोभित विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियंक भारती बताते हैं कि बूढ़ी गंगा का इतिहास भी हस्तिनापुर से गहराई से जुड़ा हुआ है. उनके मुताबिक, यहां मौजूद कई धार्मिक स्थल इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कभी गंगा की मुख्य धारा इसी रास्ते से बहती थी.

पांडेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी महाभारत काल की मान्यता

हस्तिनापुर का प्रसिद्ध पांडेश्वर महादेव मंदिर बूढ़ी गंगा से जुड़ी सबसे खास जगहों में गिना जाता है. मान्यता है कि महाभारत काल में पांचों पांडव पहले बूढ़ी गंगा में स्नान करते थे और उसके बाद भगवान शिव की पूजा करते थे. मंदिर परिसर में पांडवों की प्रतिमाएं भी लगी हुई हैं, जो इस मान्यता को और मजबूत करती हैं. इसी वजह से यहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.

द्रौपदी मंदिर और बूढ़ी गंगा का धार्मिक महत्व

पांडेश्वर महादेव मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित द्रौपदी मंदिर का भी बूढ़ी गंगा से खास संबंध बताया जाता है. मान्यता है कि माता द्रौपदी यहां स्नान करने के बाद पूजा करती थीं. मंदिर के पास आज भी पुराना घाट मौजूद है और यहां बूढ़ी गंगा की धारा देखी जा सकती है. मंदिर में लगी प्रतिमा महाभारत के चीरहरण प्रसंग की याद दिलाती है. स्थानीय लोगों का कहना है कि बूढ़ी गंगा सिर्फ आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह हस्तिनापुर की पहचान भी है. समय के साथ गंगा की मुख्य धारा अपने पुराने रास्ते से करीब 10 किलोमीटर दूर चली गई, लेकिन बूढ़ी गंगा आज भी उस पुराने मार्ग की निशानी के रूप में मौजूद है. बताया जाता है कि इसकी धारा शुक्रताल से निकलकर हस्तिनापुर के कई हिस्सों से गुजरते हुए आगे बृजघाट के पास गंगा की मुख्य धारा में मिलती है.

बूढ़ी गंगा का संरक्षण क्यों है जरूरी?

कि अगर बूढ़ी गंगा के जिन हिस्सों में रुकावट आ गई है, उन्हें फिर से साफ कर दिया जाए तो इससे जल निकासी बेहतर हो सकती है. उनका मानना है कि इससे हर साल आने वाली बाढ़ की समस्या को कम करने में भी मदद मिलेगी और किसानों को राहत मिलेगी.

शुक्रताल से बृजघाट तक दिखती है बूढ़ी गंगा की धरोहर

आज भी शुक्रताल से लेकर बृजघाट तक कई जगह बूढ़ी गंगा का पुराना रास्ता साफ दिखाई देता है. हालांकि कुछ स्थानों पर अतिक्रमण और दूसरी वजहों से इसका प्राकृतिक मार्ग प्रभावित हुआ है. स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर इस धारा का संरक्षण किया जाए और पुराने रास्ते को फिर से विकसित किया जाए, तो हस्तिनापुर की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान और मजबूत होगी. साथ ही आने वाली पीढ़ियां भी महाभारत काल से जुड़ी इस धरोहर को करीब से जान सकेंगी.

लक्की कुमारी की रिपोर्ट

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By तिलक कैरी

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