करोड़ों साल पहले ऐसे बनता था कोयला, जंगल की आग से लेकर ज्वालामुखी तक का खुला राज, BHU-गुवाहाटी की रिसर्च में खुलासा

अरुणाचल प्रदेश के सियांग विंडो क्षेत्र में करोड़ों वर्ष पहले कोयला निर्माण की प्रक्रिया पर BHU और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण खुलासा किया है. इस रिसर्च से उस समय के वातावरण, जंगलों में लगने वाली आग और ज्वालामुखी गतिविधियों की भूमिका स्पष्ट हुई है.

Coal Formation History : पूर्वी हिमालय के अरुणाचल प्रदेश स्थित सियांग विंडो क्षेत्र में करोड़ों वर्ष पहले हुई भूगर्भीय हलचलों को लेकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है. वैज्ञानिकों ने 27 से 29 करोड़ वर्ष पुराने अर्ली परमियन काल की भरेली फॉर्मेशन की चट्टानों का अध्ययन किया. शोध से उस समय के वातावरण, जंगलों में लगने वाली आग और ज्वालामुखी गतिविधियों के साथ कोयले के निर्माण की प्रक्रिया का पता चला है. यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल ऑफ अर्थ साइंसेज में प्रकाशित हुआ है. शोध टीम में गुवाहाटी विश्वविद्यालय के डॉ. दीपज्योति बोरसाइकिया और डॉ. मौसमी गोगोई तथा बीएचयू के डॉ. गोविंद कुमार और डॉ. अमिय शंकर नायक समेत छह शोधकर्ता शामिल रहे.

कभी गोंडवाना का उत्तरी छोर था यह इलाका

शोधकर्ताओं ने पेट्रोग्राफिक, आइसोटोपिक और स्पेक्ट्रोस्कोपिक तकनीकों की मदद से चट्टानों का अध्ययन किया. इससे पता चला कि सियांग विंडो क्षेत्र कभी प्राचीन महाद्वीप गोंडवाना के उत्तरी छोर का हिस्सा था. चट्टानों में मिले कार्बन के विशेष समस्थानिकों से संकेत मिलता है कि उस समय यहां ग्लोसोप्टेरिस नाम के विशाल प्रागैतिहासिक पौधों के घने जंगल मौजूद थे.

जंगलों में लगती थी बार-बार आग

शोध में मिले कोयले के विशेष तत्वों इनर्टिनाइट और माइक्रिनाइट से संकेत मिला कि उस दौर में इन जंगलों में बार-बार आग लगती थी. आग के बाद जलमग्न दलदली इलाकों में पीट का संचय होता था. पीट को कोयले का शुरुआती रूप माना जाता है. इस तरह जंगल, आग और दलदली क्षेत्रों में पीट के संचय की प्रक्रिया ने करोड़ों साल पहले यहां कोयले की परतों के निर्माण में भूमिका निभायी.

ज्वालामुखी और भूकंपीय गतिविधियों से बदलता था जलस्तर

शोध के मुताबिक यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से लगातार धंस रहा था. ज्वालामुखी विस्फोट और भूकंपीय गतिविधियों के कारण यहां जलस्तर में भी तेजी से बदलाव होता रहता था. इसी भूगर्भीय अस्थिरता के कारण इस क्षेत्र में मोटी और स्थिर कोयले की परतों के बजाय अपेक्षाकृत पतली लेकिन विशिष्ट कोयले की परतें बनीं. शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना ऑस्ट्रेलिया के सिडनी-बोवेन बेसिन जैसी परिस्थितियों से की है.

हिमालय बनने के दौरान चट्टानों पर पड़ा गर्मी और घर्षण का असर

शोध में चट्टानों की परिपक्वता और रमन सूचकांकों की भी जांच की गयी. इसमें एक अलग तरह की स्थिति सामने आयी. सामान्य तौर पर जमीन के अंदर अधिक गहराई पर जाने के साथ गर्मी और दबाव बढ़ने से चट्टानों की परिपक्वता भी बढ़ती है. लेकिन इस क्षेत्र में स्थिति इसके उलट मिली. करोड़ों साल बाद हिमालयन थ्रस्टिंग के दौरान चट्टानों के आपस में टकराने से अत्यधिक घर्षण और गर्मी पैदा हुई. इस प्रक्रिया ने चट्टानों की तापीय संरचना को प्रभावित किया. इसके कारण यहां गहराई की तुलना में स्थानीय टकराव वाले हिस्सों में कोयले और शेल की परिपक्वता अधिक दिखाई दी.

हिमालय और कोयला भंडारों के इतिहास को समझने में मिलेगी मदद

वैज्ञानिकों का यह अध्ययन पूर्वी हिमालय के भूगर्भीय इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे हिमालय की उत्पत्ति के साथ-साथ भारत में कोयले के भंडार बनने की प्राचीन प्रक्रिया को समझने में भी मदद मिल सकती है.

Also Read : आपकी ये छोटी-छोटी गलतियां उम्र से पहले कर रही हैं हड्डियों को कमजोर, युवाओं में बढ़ रहा फ्रैक्चर का खतरा, बदलें ये आदतें

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By रवि रंजन कुमार

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >