30 दिन में िसर्फ 5 दिन चलती है एक्स-रे मशीन

महिलाओं को नहीं मिलती आयरन की गोली महीनों से खराब पड़ी है अल्ट्रासाउंड मशीन चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल चाईबासा सदर अस्पताल आइएसओ सर्टिफाइड तो है, लेकिन यहां ज्यादातर चिकित्सीय सुविधा नहीं मिल रही है. अस्पताल में बीते दो वर्ष में नयी सुविधा शुरू तो नहीं हुई, वहीं पहले से […]

महिलाओं को नहीं मिलती आयरन की गोली

महीनों से खराब पड़ी है अल्ट्रासाउंड मशीन
चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल चाईबासा सदर अस्पताल आइएसओ सर्टिफाइड तो है, लेकिन यहां ज्यादातर चिकित्सीय सुविधा नहीं मिल रही है. अस्पताल में बीते दो वर्ष में नयी सुविधा शुरू तो नहीं हुई, वहीं पहले से मिल रही कई सुविधाएं बंद है. फिलहाल स्थिति यह है कि सबसे सस्ती दवा आयरन की गोली भी महिलाओं को नहीं मिल रही है. राज्य में सबसे अधिक पश्चिमी सिंहभूम की महिलाएं (एनीमिया) खून की समस्या से पीड़ित हैं. जबकि आयरन की गोली आंगनबाड़ी केंद्रों में मिलती है. हालांकि प्रस्तावित स्वास्थ्य मंत्री के दौरे को लेकर साफ-सफाई, टूटे फर्नीचर की मरम्मत, बेड के चादरों को बदला गया है. वरना मरीजों की बदहाली को कोई पूछने वाला नहीं है. प्रस्तुत है सदर अस्पताल में घटी-बढ़ी स्वास्थ्य सुविधाओं पर रिपोर्ट.
बिना अल्ट्रासाउंड कराये गरीब प्रसूता का हो रहा ऑपरेशन : पश्चिमी सिंहभूम जिला अधिसूचित क्षेत्र है. यहां गरीबी अधिक है. प्रसव के लिए गरीब महिलाओं का एक मात्र सहारा सदर अस्पताल है. प्रसव के दौरान तीन बार अल्ट्रासाउंड कराना जरूरी होता है, लेकिन सदर अस्पताल की अल्ट्रासाउंड मशीन नौ माह से खराब है. इसके कारण बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने में असक्षम प्रसूताओं का प्रसव बिना अल्ट्रासाउंड कराये ऑपरेशन होता है.
महीने में पांच दिन चालू रहती है एक्स-रे मशीन : सदर अस्पताल की एक्स-रे मशीन की गजब कहानी है. पुराने मॉडल की एक्स-रे मशीन महीने में मुश्किल से पांच से छह दिन काम करती है. इस दौरान एक्स्-रे मशीन की फिल्म खत्म हो जाती है, तो कभी-कभी खराब हो जाती है. मशीन ठीक करने और फिल्म आने में लगभग 20 से 25 दिन का समय लगता है. तबतक, मरीजों को बाहर से एक्स-रे कराना पड़ता है. फिलहाल एक्स-रे मशीन रूम में ताला लटका हुआ है.
एक वार्ड में सामान्य मरीज के साथ टीबी मरीज का इलाज : वर्तमान में एक वार्ड में सभी तरह के मरीजों को रखा जाता है. जले तथा टीबी के मरीजों के साथ अन्य बीमारियों से पीड़ित मरीजों का इलाज किया जाता है. इससे संक्रमण का खतरा बना रहता है.
पहले से हो रही जांच बंद, बाहर कराते हैं ग्रामीण : विडाल, ब्लड ग्रुप, एएसओ, एसजीपीटी, एसजीओटी, सिरम क्रियेटनी, ब्लड शुगर, लिपिट प्रोफाइल, एलएफटी, इसीजी, टीएमटी, थॉयरायड, सोडियम पोटेशियम, यूरिन एसिड, ब्लड यूरिया, केएचटी आदि जांच के लिए निर्धारित शुल्क लगता था. ये तमाम जांच अब बंद हो गये हैं.
बर्न यूनिट, नया ब्लड बैंक में लटका है ताला : जले मरीजों का इलाज के लिए सदर अस्पताल में बर्न यूनिट बनाया गया है, लेकिन इसमें ताला लटका हुआ है. सदर अस्पताल में एक ब्लड बैंक के रहते, दूसरा ब्लड बैंक बना दिया गया है. नये ब्लड बैंक में ताला लटका रहता है. पहले से चल रहे ब्लड बैंक में जरूरी सुविधा का अभाव है. ब्लड को जरूरी मानकों के अनुसार स्टोर करके नहीं रखा जा रहा है. यहां तकनीकी रूप से दक्ष कर्मियों की कमी है.
महज केमिकल खत्म होने के कारण बंद हो गयी कई जांच : केमिकल खत्म होने के कारण कई जांच बंद हो गये. हालांकि डिमांड भेजा गया है. केमिकल की कीमत भी बहुत ज्यादा नहीं है.
जर्जर वायरिंग से अकसर होती है शॉर्ट सर्किट : सदर अस्पताल की वायरिंग काफी पुरानी और जर्जर हो गयी है. बिजली बोर्ड एकदम खुला है. बोर्ड से तार बाहर निकल आये हैं. इसके कारण बार-बार शॉट सर्किट हो जाता है. वार्डों में अंधेरा पसर जाता है. वहीं दुर्घटना की आशंका रहती है.
मरम्मत नहीं कराने से खराब हो गयी कई मशीनें : सदर अस्पताल में कई जांच उपकरण मरम्मत नहीं कराने के कारण खराब हो गये. लिवर फंक्शन की जांच के लिए लगी लिपिट प्रोफाइल मशीन तीन साल से खराब है.
बाहर में यह जांच काफी महंगी है. इसी तरह कई अन्य उपकरण मरम्मत नहीं होने और टेक्नीशियन नहीं होने के कारण खराब हो गये.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >