चाईबासा . कस्तूरबा विद्यालय के उद्घाटन समारोह में बोलीं राज्यपाल चाल, चरित्र व चेहरे पर दाग न लगे

झारखंड के विद्यार्थी अपने हुनर से देश में परचम लहरा रहे हैं. खेल और संस्कृति में झारखंड के बच्चों को कोई चैलेंज नहीं कर सकता है. कस्तूरबा की छात्राओं से किया संवाद, अपना अनुभव बांटा मूक बधिर स्कूल के बच्चों से मिलीं, सरकारी लाभ दिलाने का भरोसा दिया स्पेशल बच्चों में अद‍्भुत प्रतिभा : राज्यपाल […]

झारखंड के विद्यार्थी अपने हुनर से देश में परचम लहरा रहे हैं. खेल और संस्कृति में झारखंड के बच्चों को कोई चैलेंज नहीं कर सकता है.

कस्तूरबा की छात्राओं से किया संवाद, अपना अनुभव बांटा
मूक बधिर स्कूल के बच्चों से मिलीं, सरकारी लाभ दिलाने का भरोसा दिया
स्पेशल बच्चों में अद‍्भुत प्रतिभा : राज्यपाल
चाईबासा : मूक बाधिर बच्चे काफी स्पेशल होते हैं. इनकी छठी इंद्रिया सामान्य बच्चों की तुलना में बेहतर काम करती है. सामान्य बच्चों कू तलना में मूक बाधिर बच्चों में प्रतिभा कम नहीं होती है. उक्त बातें राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को आशा किरण मूक बाधिर स्कूल के बच्चों को कहीं. राज्यपाल ने कहा कि ये बच्चे सुन और बोल नहीं सकते, लेकिन चित्रकारी व नृत्य में पारंगत होते हैं. ऐसे बच्चों को इन्हीं क्षेत्रों में आगे बढ़ाने की जरूरत है.
खुद को अपना गुरु बनायें हर राह आसान हो जायेगी
छात्राओं के साथ राज्यपाल ने अपने बचपन की यादें ताजा कीं
चाईबासा : चाईबासा कस्तूरबा गांधी बालिका स्कूल में छात्राओं ने राज्यपाल से कई सवाल पूछे. छात्राओं के रोचक सवालों का राज्यपाल ने अधिक रोचक से जवाब दिया. छात्राओं ने बचपन से राज्यपाल बनने तक के सफर पर राज्यपाल से बारी-बारी से सवाल पूछे.
सवाल- इससे पहले कभी चाईबासा आयीं थीं?
जवाब – हां, राज्यपाल बनने से पहले चाईबासा आयी थी. तब, मैं एमएलए थीं. चक्रधरपुर में मेरी दादी का घर है. इस कारण यहां आना-जाना लगा रहा है. राज्यपाल बनने के बाद पहली बार आयी हूं.
सवाल- क्या आप हॉस्टल में रहकर पढ़तीं थीं?
जवाब- हां, मैं हॉस्टल में रहकर ही पढ़ी हूं.
सवाल- मैं आपकी तरह बनना चाहती हूं।
जवाब- आप मेरी तरह नहीं बनें. आप अपनी तरह बनें. आपकी रुचि किस फील्ड में है, ये देखते हुए लक्ष्य निर्धारित करें. उस पर कड़ी मेहनत कर आगे बढ़ें. आप खुद अपना गुरु बनें, खुद से सवाल करें. क्या सही है, क्या गलत है. आपकी कमजोरी क्या है, आपकी मजबूती क्या है, इसका खुद आकलन करें. राह आसान हो जायेगी. मेरी दादी ने मुझे बचपन में सिखाया था कि खुद को अपना गुरु बना लो. फिर, हर काम आसान हो जायेगा.
सवाल- क्या आप बचपन में नटखट थीं?
जवाब- हां, मैं बचपन में बहुत नटखट थीं. स्कूल में कुछ भी होने से वार्डेन मुझे ही बुलाती थीं. नटखट रहने के कारण मुझे बहुत बात सुननी पड़ी है. खासकर वार्डेन से मुझे बहुत डांट पड़ी है.
सवाल- हम लोगों से मिलकर आपको कैसा लग रहा है?
जवाब- मुझे बहुत अच्छा लग रहा है. मुझे लग रहा है कि मैं बचपन में चली गयी हूं. फिर, स्कूल जाना है और स्कूल जाकर पढ़ाई करनी है. आप सभी को मुझे स्कूल लाइफ याद कराने के लिए शुक्रिया.
सवाल- क्या आपने कभी सोचा था कि आप राज्यपाल बन जायेंगीं?
जवाब- नहीं, मैने कभी नहीं सोचा था कि मैं राज्यपाल बनूंगी. मेरे साथ परिस्थिति वैसी नहीं थी. परिस्थिति के अनुसार कभी भी राज्यपाल बनने का ख्याल नहीं आया था.
सवाल- तो आप क्या बनने की सोचीं थीं?
जवाब- मेरे घर में कोई पढ़ा-लिखा नहीं था. सभी अशिक्षित थे. घर में काफी गरीबी थी. तब, मेरे मन में एक ही बात आयी थी कि पढ़-लिखकर परिवार को आर्थिक रूप से सहयोग करूंगी. इसके अलावा कोई भी ख्याल पढ़ाई करने के वक्त नहीं आया था. हां, सामाजिक सोच थी. समाज के प्रति करुण शुरू से थी. शायद, उसी का नतीजा है कि मैं बतौर राज्यपाल आपके समक्ष खड़ी हूं.

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