रांची के मोराबादी मैदान में 30 अगस्त को हुआ ‘आदिवासी एकता महाजुटान’ सिर्फ परिसीमन के खिलाफ एक सामाजिक आंदोलन नहीं था. राजनीतिक ऑप्टिक्स से देखें तो यह झारखंड कांग्रेस की एक बड़ी कोशिश भी नजर आती है- आदिवासी प्रतिनिधित्व के सवाल को अपने राजनीतिक नैरेटिव के केंद्र में लाना.
रैली का नेतृत्व कांग्रेस नेता बंधु तिर्की ने किया. मंच पर प्रदेश कांग्रेस के बड़े चेहरे मौजूद रहे और राहुल गांधी का संदेश भी पढ़ा गया. दूसरी ओर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद रैली में नहीं पहुंचे, लेकिन JMM की ओर से विधायक विकास मुंडा मौजूद रहे.
यही तस्वीर झारखंड की राजनीति में कई सवाल खड़े करती है. आखिर कांग्रेस इस मुद्दे को इतना बड़ा क्यों बना रही है? और क्या इसके पीछे सिर्फ आदिवासी अधिकारों की लड़ाई है?
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1. कांग्रेस का पहला संदेश: ‘आदिवासी प्रतिनिधित्व’ को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना
कांग्रेस की रणनीति को समझने के लिए सबसे पहले उसके मुद्दे को देखना जरूरी है.
रैली में परिसीमन को सिर्फ सीटों की संख्या का सवाल नहीं बनाया गया. इसे आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संविधान और जल-जंगल-जमीन के अधिकार से जोड़ दिया गया.
कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के. राजू ने रैली में BJP और RSS पर आदिवासी प्रतिनिधित्व कमजोर करने की साजिश का आरोप लगाया और कहा कि पार्टी आदिवासी समाज के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ी रहेगी.
यानी कांग्रेस का नैरेटिव साफ है-
Delimitation → Tribal Representation → Constitutional Rights → BJP/NDA की नीतियां
राजनीतिक रूप से यह कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे परिसीमन जैसे तकनीकी और जटिल मुद्दे को सीधे आदिवासी पहचान और राजनीतिक भविष्य से जोड़ा जा सकता है.
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि भविष्य के परिसीमन में झारखंड की ST आरक्षित सीटें वास्तव में कितनी बदलेंगी, यह अभी तय नहीं है. फिलहाल झारखंड में 81 विधानसभा सीटों में 28 ST आरक्षित और 14 लोकसभा सीटों में 5 ST आरक्षित हैं.
2. राहुल गांधी की एंट्री: बिना आए भी राष्ट्रीय चेहरा
राहुल गांधी खुद मोराबादी मैदान नहीं पहुंचे, लेकिन उनका संदेश मंच से पढ़ा गया.
राजनीतिक ऑप्टिक्स में यह छोटा संकेत नहीं है.
राहुल गांधी का संदेश आदिवासी अधिकारों, जल-जंगल-जमीन, पांचवीं अनुसूची, PESA और वनाधिकार जैसे मुद्दों से जुड़ा था.
इससे कांग्रेस दो स्तरों पर संदेश देने की कोशिश करती दिखाई देती है.
झारखंड में: कांग्रेस खुद को आदिवासी अधिकारों की राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित करना चाहती है.
दिल्ली में: परिसीमन के सवाल को BJP बनाम विपक्ष की बड़ी संवैधानिक बहस से जोड़ना चाहती है.
यानी मोराबादी का मंच स्थानीय था, लेकिन संदेश राष्ट्रीय बनाने की कोशिश की गई.
3. असली राजनीतिक प्रतियोगिता BJP से ज्यादा JMM से भी है
यहीं इस पूरी कवायद की सबसे दिलचस्प परत सामने आती है.
झारखंड में आदिवासी राजनीति का सबसे मजबूत राजनीतिक ब्रांड लंबे समय से JMM और सोरेन परिवार के आसपास रहा है.
ऐसे में कांग्रेस के लिए चुनौती केवल BJP नहीं है. उसे आदिवासी वोटर के बीच अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान भी मजबूत करनी है.
मोराबादी महाजुटान में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की मौजूदगी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है. प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, प्रभारी के. राजू, रमेश्वर उरांव, शिल्पी नेहा तिर्की, सुबोधकांत सहाय समेत कई कांग्रेस नेता मंच पर मौजूद थे.
दूसरी तरफ हेमंत सोरेन ने कार्यक्रम में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने के बजाय अपना प्रतिनिधि भेजा और संदेश के जरिए समर्थन दिया.
राजनीतिक संदेश पढ़ें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है:
Congress: 'आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में हमारी भी केंद्रीय भूमिका है.'
JMM: 'आंदोलन का समर्थन हमारा भी है, लेकिन मंच कांग्रेस का है.'
यही अंतर भविष्य में दोनों सहयोगी दलों के बीच आदिवासी राजनीतिक स्पेस को लेकर प्रतिस्पर्धा का संकेत दे सकता है.
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4. ‘जल-जंगल-जमीन’ के साथ Sarna Code: कांग्रेस का बड़ा सामाजिक गठजोड़
अगर कांग्रेस केवल परिसीमन पर बात करती तो इसका असर सीमित रह सकता था.
लेकिन महाजुटान में Sarna Code, CNT-SPT Act, Fifth Schedule, PESA, Forest Rights और जल-जंगल-जमीन जैसे मुद्दों को भी जोड़ा गया.
यही कांग्रेस की राजनीतिक ऑप्टिक्स का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है.
कांग्रेस एक ऐसा मुद्दा-संग्रह तैयार करती दिखती है जिसमें अलग-अलग आदिवासी समूहों की चिंताओं को एक साझा राजनीतिक फ्रेम में रखा जा सके.
Sarna identity → सांस्कृतिक पहचान CNT-SPT → जमीन PESA/Fifth Schedule → संवैधानिक स्वायत्तता Forest Rights → जंगल Delimitation → राजनीतिक प्रतिनिधित्व Jal-Jungal-Zameen → व्यापक आदिवासी अधिकार
यानी लक्ष्य सिर्फ एक चुनावी मुद्दा बनाना नहीं, बल्कि एक व्यापक tribal rights narrative तैयार करना है.
5. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल: क्या यह वोट में बदलेगा?
यही पूरी रणनीति की असली परीक्षा है.
मोराबादी में बड़ी भीड़ जुटना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन भीड़ और वोट बैंक एक ही चीज नहीं हैं.
कांग्रेस के सामने तीन लक्ष्य हो सकते हैं:
- पहला: आदिवासी समाज में BJP के खिलाफ राजनीतिक ध्रुवीकरण को मजबूत करना.
- दूसरा: JMM के पारंपरिक आदिवासी राजनीतिक स्पेस में कांग्रेस की हिस्सेदारी बढ़ाना.
- तीसरा: राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी और कांग्रेस को आदिवासी अधिकारों के मुद्दे से जोड़ना.
रैली में कांग्रेस की मजबूत मौजूदगी और राहुल गांधी के संदेश ने इन तीनों लक्ष्यों को एक ही मंच पर जोड़ दिया. वहीं JMM की ओर से हेमंत सोरेन के प्रतिनिधि की मौजूदगी ने यह भी दिखाया कि मुद्दा इतना महत्वपूर्ण है कि सत्तारूढ़ गठबंधन इससे दूरी नहीं बना सकता.
कांग्रेस की पूरी राजनीतिक तस्वीर क्या कहती है?
मोराबादी महाजुटान को सिर्फ 'परिसीमन विरोधी रैली' मानना शायद इसकी पूरी राजनीतिक कहानी नहीं बताता.
कांग्रेस के नजरिए से देखें तो यह एक narrative-building exercise है.
परिसीमन को आदिवासी प्रतिनिधित्व से जोड़ना, प्रतिनिधित्व को संविधान से जोड़ना, संविधान को जल-जंगल-जमीन से जोड़ना और फिर इन मुद्दों के साथ राहुल गांधी के राष्ट्रीय नेतृत्व को जोड़ना- यह एक स्पष्ट राजनीतिक संचार रणनीति दिखाई देती है.
लेकिन इसके साथ एक राजनीतिक जोखिम भी है.
यदि आदिवासी संगठन इसे कांग्रेस के राजनीतिक मंच के रूप में देखने लगते हैं, तो कांग्रेस का दावा कमजोर पड़ सकता है कि यह एक व्यापक गैर-दलीय आदिवासी आंदोलन है. इसी तरह JMM के साथ गठबंधन की राजनीति में भी यह सवाल महत्वपूर्ण रहेगा कि आदिवासी राजनीति का चेहरा कौन बनेगा- सोरेन परिवार या कांग्रेस का नया नेतृत्व?
इसलिए मोराबादी की असली कहानी शायद परिसीमन से भी बड़ी है. यह झारखंड में आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की अगली लड़ाई के लिए जमीन तैयार करने की कोशिश भी हो सकती है.
