ट्रेन लेट होने पर यात्री पहुंचा Consumer Commission, रेलवे को लगा ₹35 हजार का झटका

उपभोक्ता आयोग ने ट्रेन में 8 घंटे 48 मिनट की देरी पर रेलवे को यात्री को 35,000 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। जानें क्या है पूरा मामला।

सरायकेला. ट्रेन में अत्यधिक देरी से यात्रियों को हुई मानसिक, शारीरिक और वित्तीय परेशानी को लेकर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, सरायकेला-खरसावां ने रेलवे के खिलाफ बड़ा फैसला सुनाया है. आयोग ने रेलवे को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए शिकायतकर्ता को कुल ₹35,000 मुआवजा देने का आदेश दिया है. यह राशि दक्षिण पूर्व रेलवे और ईस्ट कोस्ट रेलवे को मिलकर देनी होगी.

मामला आदित्यपुर-2 के बाबा आश्रम निवासी संजय कुमार से जुड़ा है. उन्होंने 23 सितंबर 2024 को टाटानगर से संबलपुर जाने के लिए इस्पात एक्सप्रेस में दो टिकट बुक किये थे. निर्धारित समय के अनुसार ट्रेन को सुबह 10:18 बजे टाटानगर से रवाना होकर शाम 3:50 बजे संबलपुर पहुंचना था. लेकिन ट्रेन करीब 528 मिनट यानी 8 घंटे 48 मिनट की देरी से संबलपुर पहुंची.

ट्रेन की अत्यधिक देरी से हुई परेशानी को लेकर संजय कुमार ने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करायी. खास बात यह रही कि उन्होंने बिना किसी वकील के खुद अपने मामले की पैरवी की. सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से अधिवक्ता डीएल विश्वकर्मा ने आयोग के क्षेत्राधिकार पर सवाल उठाया. रेलवे ने तर्क दिया कि मामला रेलवे दावा अधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत आता है और उपभोक्ता आयोग को इसकी सुनवाई का अधिकार नहीं है.

रेलवे की ओर से यह भी दलील दी गयी कि मामले में आईआरसीटीसी को पक्षकार नहीं बनाया गया है और शिकायतकर्ता देरी के कारण हुए किसी ठोस वित्तीय नुकसान का प्रमाण नहीं दे सके हैं. आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह, सदस्य प्रदीप कुमार मिश्रा और संजू शाही की पीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद रेलवे की दलीलों को खारिज कर दिया.

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के नॉर्दर्न वेस्टर्न रेलवे बनाम संजय शुक्ला मामले में दिये गये फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यात्रियों का समय महत्वपूर्ण है. यदि रेलवे ट्रेन की देरी का कोई उचित, वैध और अपने नियंत्रण से बाहर का कारण साबित नहीं कर पाता है, तो इसे सेवा में कमी माना जा सकता है.

मानसिक प्रताड़ना के लिए ₹30 हजार, कानूनी खर्च के ₹5 हजार

आयोग ने रेलवे को शिकायतकर्ता को मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के लिए ₹30,000 तथा वाद व्यय के रूप में ₹5,000 देने का आदेश दिया है. इस तरह कुल ₹35,000 का भुगतान करना होगा.

आदेश के अनुसार रेलवे को 45 दिनों के भीतर पूरी राशि का भुगतान करना होगा. निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं करने पर आदेश की तारीख से भुगतान की तारीख तक 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा.

बताया गया कि ट्रेन में देरी के मामले में संजय कुमार की यह तीसरी बड़ी जीत है. उपभोक्ता आयोग के इस फैसले से ट्रेन में अत्यधिक देरी के कारण परेशान होने वाले यात्रियों के अधिकार और रेलवे की जवाबदेही का मुद्दा एक बार फिर सामने आया है.

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लेखक के बारे में

By प्रताप कुमार मिश्रा

प्रताप कुमार मिश्रा वर्ष 2003 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्होंने कोल्हन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक किया है. राजनीतिक, सामाजिक, क्राइम, खेल की खबरों में इन्हें विशेषज्ञता हासिल है. डिजिटल जर्नलिज्म में 10 साल का अनुभव है.

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