सरायकेला : सरायकेला-खरसावां जिले के हेंसा गांव निवासी सेवानिवृत्त हवलदार शंकर सोय का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है. बिहार रेजिमेंट की 15वीं बटालियन में करीब 21 वर्षों तक सेवा देने वाले शंकर सोय का जीवन साहस, अनुशासन और अटूट कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल है. शंकर सोय को सेना में जाने की प्रेरणा अपने घर से मिली. उनके पिता झारखंड आंदोलन में सक्रिय रहे थे. ऐतिहासिक खरसावां गोलीकांड के प्रत्यक्षदर्शी रहे. पिता के जीवन का संघर्ष, उनका त्याग और देश-समाज के प्रति समर्पण देखकर युवा शंकर के मन में देश के लिए कुछ बड़ा कर गुजरने का बीज अंकुरित हो चुका था. 10वीं की पढ़ाई के बाद उन्होंने सेना में जाने की ठानी. 28 अप्रैल 1995 को वे बिहार रेजिमेंट की 15वीं बटालियन में शामिल हुए.
जब बालाकोट में पाकिस्तान की ओर से हुई ताबड़तोड़ फायरिंग...
शंकर सोय ने बताया - जम्मू-कश्मीर के संवेदनशील इलाकों में तैनाती के दौरान सैनिकों को पल-पल मौत का सामना करना पड़ता है. उनके फौजी जीवन में कई ऐसे पल आये, जब उनके अदम्य साहस की परीक्षा हुई. इनमें एक रोंगटे खड़े कर देने वाला वाकया जम्मू-कश्मीर की बालाकोट पोस्ट का है. एक दिन अचानक पाकिस्तान की ओर से सीमा पार से ताबड़तोड़ और भारी गोलाबारी शुरू हो गयी. भारतीय जवानों ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए मुंहतोड़ जवाब दिया. इस भीषण फायरिंग के बीच चार भारतीय जवान गंभीर रूप से घायल हो गये.
घायल जवानों को एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचाया
शंकर सोय ने बताया - घायल जवानों को सुरक्षित नजदीकी अस्पताल तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती थी. और यह जोखिम भरा जिम्मा उन्हें मिला. दुश्मन लगातार गोलियों की बौछार कर रहा था, लेकिन शंकर सोय ने एक पल के लिए भी अपनी जान की परवाह नहीं की. एंबुलेंस की स्टीयरिंग थामे वे सीधे गोलियों की आवाज के बीच आगे बढ़े. सभी घायल जवानों को सुरक्षित एंबुलेंस में लादकर अस्पताल पहुंचाया. उस मुश्किल घड़ी को याद करते हुए बताते हैं कि उस वक्त उनके मन में डर का नामोनिशान तक नहीं था. सिर्फ एक ही लक्ष्य था, अपने घायल साथियों की जान बचाना. गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच उनका हौसला अडिग रहा.
महीनों इंतजार के बाद चिट्ठियों से पता चलता था परिवार का हाल
आज के दौर में जब हर किसी के हाथ में स्मार्टफोन है. परिवार से जुड़ना चंद सेकंड का काम है. उस दौर के फौजियों के संघर्ष की कल्पना करना भी कठिन है. 90 के दशक और उसके बाद के वर्षों में मोबाइल फोन नहीं होते थे. परिवार से संपर्क साधने का एकमात्र जरिया महीनों पुरानी चिट्ठियां या कभी-कभार मिलने वाला लैंडलाइन फोन होता था. लगातार गोलीबारी और 24 घंटे हाई-अलर्ट पर रहने के कारण कई बार महीनों घर की सुध लेने का समय नहीं मिलता था. शंकर सोय बताते हैं कि उन्हें कभी अकेलापन या परिवार से दूर होने का अहसास नहीं हुआ, क्योंकि पूरा देश ही उनका परिवार बन चुका था.
सीमा पर तिरंगा लहराता देख सारी थकान मिट जाती थी
जब सीमा पर तिरंगा लहराता था और देशभक्ति के गीत गूंजते थे, तो सारी थकान और दुश्वारियां गायब हो जाती थीं. तिरंगे के प्रति सम्मान और मातृभूमि की रक्षा का संकल्प और अधिक मजबूत हो जाता था. अपनी उत्कृष्ट सेवाओं और अदम्य साहस के चलते उन्हें कई प्रतिष्ठित पदकों से सम्मानित किया गया. वर्ष 2002 में पराक्रम मेडल, 2005 में सैन्य सेवा मेडल और 2008 में सियाचिन ग्लेशियर मेडल जैसे सम्मान उनके उस गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं, जिन्हें वे आज भी अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं.
सेवानिवृत्ति के बाद युवाओं को बना रहे फौज का सिपाही
31 अगस्त, 2016 को हवलदार के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद शंकर सोय ने समाज और देश के लिए कुछ नया करने की ठानी. आज वे अपने गांव हेंसा में खेती-बारी संभालने के साथ-साथ सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं. वे सेना, पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों में भर्ती होने का सपना देखने वाले स्थानीय ग्रामीण युवाओं को खुद आगे आकर प्रशिक्षित कर रहे हैं. वे युवाओं को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के साथ-साथ अनुशासन, समय की पाबंदी और कड़ी मेहनत का पाठ पढ़ाते हैं.
युवाओं को संदेश- देशसेवा को समझें सौभाग्य
शंकर सोय की कहानी बताती है कि देशभक्ति केवल शब्दों में व्यक्त करने की चीज नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने का नाम है. सीमा पर गोलियों के बीच घायल जवानों तक पहुंचने वाला वह साहस आज गांव के युवाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा है. उनका संदेश है कि युवाओं को अनुशासन और मेहनत के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए. देश की सेवा करने का अवसर मिले, तो उसे अपना सौभाग्य समझना चाहिए. देश की सेवा केवल सीमा पर जाकर ही नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाकर भी की जा सकती है.
