सरायकेला. ऐतिहासिक व सांस्कृतिक नगरी सरायकेला की प्रसिद्ध रथयात्रा के क्रम में रविवार को मौसीबाड़ी में महाप्रभु श्री जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा ने भक्तों को ''राम-परशुराम'' अवतार में अलौकिक दर्शन दिए. भगवान के इस अनूठे और दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी. जय जगन्नाथ के जयघोष से पूरा मंदिर परिसर गुंजायमान रहा और वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया.
वर्षों पुरानी है विग्रहों के विभिन्न रूपों में शृंगार की परंपरा
सरायकेला की रथयात्रा की सबसे बड़ी विशिष्टताओं में से एक महाप्रभु की विभिन्न वेशों में शृंगार परंपरा है. वर्षों से चली आ रही इस समृद्ध परंपरा के तहत रथयात्रा के दौरान प्रतिदिन भगवान के विग्रहों को अलग-अलग दिव्य और पौराणिक स्वरूपों में सजाया जाता है. यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का सर्वोच्च प्रतीक है, बल्कि सरायकेला की अनमोल सांस्कृतिक विरासत की पहचान भी मानी जाती है.
राजपरिवार और महापात्र परिवार निभा रहे हैं जिम्मेदारी
ओड़िशा के पुरी की तर्ज पर सरायकेला राजपरिवार आज भी रथयात्रा के सभी प्रमुख अनुष्ठानों का पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन करता है. वर्तमान महाराज के संरक्षण में परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ सभी धार्मिक कार्य संपन्न कराए जा रहे हैं. वहीं, महापात्र परिवार दशकों से महाप्रभु के विग्रहों का विशेष शृंगार कर इस ऐतिहासिक विरासत को पूरी जीवंतता के साथ आगे बढ़ा रहा है.
गुरु सुशांत महापात्र के मार्गदर्शन में हुआ दिव्य शृंगार
रविवार को महाप्रभु श्री जगन्नाथ और भ्राता बलभद्र को राम-परशुराम अवतार के भव्य स्वरूप में सजाया गया, जबकि उनके साथ बहन सुभद्रा भी अलौकिक व आकर्षक शृंगार में विराजमान रहीं. इस विशेष वेश की सज्जा प्रख्यात गुरु सुशांत महापात्र के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुई. इस सेवा कार्य को धरातल पर उतारने में पार्थ सारथी दास, उज्ज्वल सिंह, सुमित महापात्र, अनुभव सतपथी, शुभम कर, कान्हू महापात्र, मुकेश साहू एवं गौतम बनर्जी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. महाप्रभु के इस मनोरम और अलौकिक रूप को निहारने के लिए दिनभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा. भक्तों ने कतारबद्ध होकर भगवान के दर्शन किए और क्षेत्र की सुख, समृद्धि, शांति तथा जन-कल्याण की कामना की.
