सरायकेला-खरसावां जिले में महाप्रभु जगन्नाथ की वापसी यात्रा यानी बाहुड़ा रथ यात्रा की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. गुंडिचा मंदिर (मौसीबाड़ी) में एक सप्ताह से अधिक समय तक रहने के बाद शुक्रवार को भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा रथ पर सवार होकर श्रीमंदिर के लिए रवाना होंगे.
सरायकेला, खरसावां, हरिभंजा और चांडिल सहित पूरे क्षेत्र में रथों और मंदिरों को आकर्षक तरीके से सजाया गया है. श्रद्धालुओं में बाहुड़ा यात्रा को लेकर उत्साह देखा जा रहा है.
विधि-विधान के साथ हुआ दक्षिणामुख संस्कार
बाहुड़ा यात्रा से पहले गुंडिचा मंदिर में वैदिक मंत्रों के साथ भगवान जगन्नाथ के नंदिघोष रथ को श्रीमंदिर की दिशा में मोड़ा गया. इस परंपरा को दक्षिणामुख संस्कार कहा जाता है.
सरायकेला में बाहुड़ा यात्रा दो दिनों तक चलेगी. शुक्रवार को रथ रवाना होने के बाद रास्ते में रात्रि विश्राम करेगा और शनिवार को श्रीमंदिर पहुंचेगा. वहीं खरसावां, हरिभंजा, चांडिल, सीनी, गम्हरिया और आदित्यपुर में यात्रा एक ही दिन में पूरी होगी.
रथ पर सवार भगवान के दर्शन का है विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रथ पर विराजमान महाप्रभु जगन्नाथ के दर्शन का विशेष महत्व है. श्रद्धालु मानते हैं कि भगवान के दर्शन से जीवन में सुख-शांति और आशीर्वाद प्राप्त होता है.
छप्पन भोग और मां लक्ष्मी को मनाने की निभेगी परंपरा
हरिभंजा में श्रीमंदिर पहुंचने के बाद चतुर्धा मूर्ति को छप्पन भोग और अधरपणा की परंपरा पूरी की जाएगी. इसके बाद भगवान जगन्नाथ और मां लक्ष्मी के बीच मान-मनौवल की परंपरा निभाई जाएगी.
मान्यता है कि नौ दिनों तक मौसीबाड़ी में रहने के कारण मां लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं और श्रीमंदिर का द्वार बंद कर देती हैं. इसके बाद भगवान जगन्नाथ उन्हें रसगुल्ला भेंट कर मनाते हैं और मंदिर का द्वार खोला जाता है. गुरुवार को सरायकेला स्थित गुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ ने भक्तों को मत्स्य और कच्छप (कछुआ) अवतार के रूप में दर्शन दिए. गुरु सुशांत महापात्र और उनके सहयोगियों द्वारा की गई विशेष वेश-सज्जा सरायकेला की गुंडिचा मंदिर परंपरा की खास पहचान है. इस विशेष दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे.
