Tribal Mahakumbh: राजमहल की उत्तर वाहिनी गंगा में लाखों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी, मरांग बुरू का जलाभिषेक

Tribal Mahakumbh: झारखंड के साहिबगंज जिले में राजमहल की उत्तर वाहिनी गंगा आस्था का केंद्र बनी. माघी पूर्णिमा मेले में लाखों आदिवासी श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान कर मरांग बुरू का जलाभिषेक किया. यह आयोजन आदिवासी संस्कृति, साफा होड़ परंपरा और सामाजिक चेतना का संगम है. पूरी खबर नीचे पढ़ें.

राजमहल में दीप सिंह की रिपोर्ट

Tribal Mahakumbh: झारखंड के साहिबगंज जिले के राजमहल में आयोजित राजकीय माघी पूर्णिमा मेला 2026 (आदिवासी महाकुंभ) के अवसर पर रविवार को उत्तर वाहिनी गंगा तट आस्था और श्रद्धा का विशाल केंद्र बन गया. झारखंड के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और नेपाल से आए लाखों आदिवासी एवं गैर-आदिवासी श्रद्धालुओं ने गंगा के विभिन्न घाटों पर पावन स्नान कर पुण्य अर्जित किया. पूरे क्षेत्र में हर-हर गंगे और पारंपरिक आदिवासी मंत्रोच्चार की गूंज सुनाई देती रही.

उत्तर वाहिनी गंगा तट पर अस्थायी अखाड़ा

गंगा तट पर विदिन समाज सुसार बैसी की ओर से पारंपरिक अखाड़ा के साथ अस्थायी मांझी थान और जाहेर थान का निर्माण किया गया. धर्मगुरु अभिराम मरांडी और भुगलू मरांडी के नेतृत्व में समाज के अनुयायियों ने गंगा स्नान के बाद मांझी थान में मरांग बुरू (भगवान शिव स्वरूप) को स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की. पूजा के दौरान पूरे परिसर में आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिली.

गंगा स्नान के बाद सूर्य देव ‘चांदो बोंगा’ की विशेष आराधना

आदिवासी श्रद्धालु गंगा की पावन धारा में स्नान कर पीतल के लोटे में जल भरते हैं और गंगा में खड़े होकर सफा होड़ समुदाय द्वारा सूर्य देव ‘चांदो बोंगा’ की सामूहिक पूजा करते हैं. मान्यता है कि सूर्य देव के बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है और हर जीव में उन्हीं की कृपा निहित है. माघी पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु 24 घंटे का उपवास रखते हैं, रात भर जागरण करते हैं और भोर में सूर्य को जल अर्पित करते हैं.

शिव-पार्वती और जाहेर आयो को जल अर्पण की परंपरा

सूर्य पूजन के पश्चात श्रद्धालु अपने-अपने धर्मगुरुओं के अखाड़ों में पहुंचते हैं. यहां अस्थायी रूप से स्थापित मांझी थान में शिव-पार्वती और जाहेर थान में जाहेर आयो को गंगाजल अर्पित किया जाता है. श्रद्धालु समृद्धि, खुशहाली और निरोगी जीवन की कामना करते हैं. यह पूरी प्रक्रिया सामूहिक और अनुशासित रूप से संपन्न होती है.

साफा होड़ समुदाय की विशिष्ट धार्मिक पहचान

साफा होड़ समुदाय संथाल समाज का ही एक अंग है, लेकिन उनकी धार्मिक मान्यताएं कुछ अलग हैं. जहां पारंपरिक संथाल धर्म में मरांग बुरू, जाहेर एरा, गोसाईं एरा और मोड़ें के तुरुई को प्रमुख देवता माना जाता है, वहीं साफा होड़ समुदाय सूर्य देव, विष्णु, महेश, शिव और राम को भी मान्यता देता है. यह समुदाय विशुद्ध संथाल परंपरा के भीतर रहकर एकेश्वरवाद की अवधारणा को अपनाता है.

सादा जीवन, शुद्ध आचरण और नशामुक्त समाज का संदेश

साफा होड़ समुदाय सादा जीवन और शुद्ध आचरण के लिए जाना जाता है. यह समुदाय मांस भक्षण, मदिरापान और धूम्रपान से परहेज करता है. सादा वस्त्र, सरल खान-पान और अनुशासित जीवनशैली इसकी पहचान है. समुदाय के लोग दूसरों के घरों में भी सहजता से भोजन नहीं करते और आत्मसंयम को सर्वोच्च मानते हैं.

धर्मगुरु अखाड़ों के माध्यम से नशा मुक्ति का प्रचार

साफा होड़ धर्मगुरु अपने अखाड़ों के माध्यम से समाज को हिंसा, नशापान और जीव हत्या से दूर रहने का संदेश देते हैं. जलकुंड या जलाशयों में सूर्य देव की पूजा के साथ-साथ मरांग गुरु, पिल्चू हाड़म, पिलिचुरी बूढ़ी और जाहेर थानों की आराधना की जाती है. घरों में तुलसी पिंड और शिव का त्रिशूल स्थापित करना भी इस परंपरा का हिस्सा है.

भागीरथ मांझी और साफा होड़ आंदोलन का इतिहास

साफा होड़ आंदोलन की जड़ें 1874 के खेरवार (साफा होड़) आंदोलन से जुड़ी हैं, जिसका नेतृत्व भागीरथ मांझी, लाल हेंब्रम और पाइका मुर्मू ने किया था. इस आंदोलन ने संथाल समाज में एक ईश्वरवाद, स्वच्छ जीवन और नशामुक्ति का संदेश फैलाया. आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला, लेकिन ब्रिटिश शासन के दमन और 1855 के संथाल हूल के बाद यह धार्मिक सुधार आंदोलन तक सीमित रह गया.

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आज भी जीवंत है आंदोलन की विरासत

वर्तमान में राजमहल की उत्तर वाहिनी गंगा में उमड़ने वाले साफा होड़ श्रद्धालु खुद को भागीरथ मांझी के अनुयायी मानते हैं. माघी पूर्णिमा का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक चेतना, इतिहास और सामाजिक सुधार की जीवंत मिसाल भी है. राजमहल का यह आदिवासी महाकुंभ एक बार फिर साबित करता है कि गंगा तट केवल स्नान का स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, परंपरा और सामाजिक मूल्यों का जीवंत संगम है.

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By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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