80 गोलियां, आधा घंटे का दहशत और फिर खामोशी. 19 अप्रैल 1985 को बोरियो के बांझी में जब पुलिस ने अपनी ही जनता पर गोलियां बरसाईं, तो धरती पर एक तरफ आदिवासियों के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे पूर्व सांसद फादर एंथोनी मुर्मू गिरे, तो दूसरी तरफ महाजनी शोषण के खिलाफ खड़े 14 बेबस संताल ढेर हो गये. आज 41 साल बाद भी ये खूनी अध्याय झारखंड के इतिहास का सबसे दर्दनाक पन्ना है, जिसे सिर्फ पांच-पांच हजार रुपये के मुआवजे और भुलावे में दफनाने की कोशिश की गयी. सोनू ठाकुर, बोरियो महाजनी प्रथा के खिलाफ और आदिवासियों के जल, जंगल व जमीन के अधिकार की लड़ाई में पूर्व सांसद फादर एंथोनी मुर्मू सहित 15 संतालों ने 19 अप्रैल 1985 को बांझी में अपनी जान दी थी. शनिवार को इस दर्दनाक गोलीकांड की 41वीं बरसी है. बोरियो का चर्चित बांझी गोलीकांड आज भी आदिवासी समुदाय की यादों में ताजा है. उस दिन पुलिस ने सरेआम करीब 80 चक्र गोलियां चलाकर इन आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया था. दरअसल, बांझी में एक तालाब है, जहां वर्षों से संताल मछली मारते आ रहे थे. इस तालाब पर मोती भगत नामक महाजन ने कब्जा कर संतालों को मछली मारने से रोक दिया था. विवाद बढ़ने पर तालाब के एक कोने में मछली मारने की बात कही गयी. हंगामा तब शुरू हुआ, जब मछली मारने के समय संतालों को एक युवक मुटरू मुर्मू का सड़ा हुआ शव मिला. मुटरू कुछ दिन पहले महंगे जेवर पहनकर शादी समारोह में जाने की बात कहकर गायब हुआ था. आरोप लगा कि हत्या में मोती भगत का हाथ है और इसी कारण वे तालाब में मछली मारने से रोक रहा था. शव मिलते ही डर से मोती भगत फरार हो गया, लेकिन आक्रोशित संतालों ने प्रशासन से शिकायत की और महाजन के घर को तहस-नहस कर दिया. मामला शांत करने के लिए प्रशासन ने उस दिन कार्रवाई का आश्वासन दिया, लेकिन उसी दिन शाम मोती भगत के लोगों ने बांझी बाजार में कुछ संतालों को पीट दिया, जिससे नाराजगी चरम पर पहुंच गयी. गोलियाें की आवाज से गूंज उठा था इलाका न्यायिक आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, संताल और गैर-आदिवासियों के बीच तनाव बढ़ने पर प्रशासन ने हस्तक्षेप किया, लेकिन षड्यंत्र के तहत पुलिस ने आदिवासियों के खिलाफ ही कार्रवाई कर दी. आंदोलन कर रहे पूर्व सांसद फादर एंथोनी मुर्मू समेत 14 संतालों पर पुलिस ने गोलीबारी कर दी. करीब आधा घंटा तक चली इस पुलिसिया फायरिंग में 80 चक्र गोलियां चलायी गयीं. इस नरसंहार में फादर एंथोनी के अलावा मदन मुर्मु, ठाकुर टुडू, दुखन टुडू, पांडा मरांडी, बोदगा हेंब्रम, बड़का मुर्मू, मुंशी कर्मकार, मोदगो मुर्मू, मरांग मुर्मू, सकला टुडू, कादना मुर्मू, अन्ना मुर्मू, दमया बेसरा व त्रिभुवन मरांडी शहीद हुए. आदिवासियों के मसीहा के रूप में जाने जाते थे एंथोनाी मुर्मू फादर एंथोनी मुर्मू 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर पहली बार सांसद बने थे. बाद में चुनाव हारने के बाद वे सामाजिक कार्यों से जुड़ गये. क्षेत्र में जनता के बीच जाकर किये गये उनके महत्वपूर्ण आंदोलनों से उनकी पकड़ जनता के बीच काफी मजबूत हो गयी थी. आदिवासियों के लिए वे मसीहा के रूप में उभरे हुए थे. उन दिनों दिशोम गुरु शिबू सोरेन भी महाजनों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. गोलीकांड के बाद बांझी समेत आसपास के गांवों में दहशत का ऐसा माहौल था कि लोगों ने घरों के दरवाजे बंद कर लिये. डर के मारे गोलीबारी में घायल लोग भी अस्पताल नहीं गये और घरों में ही इलाज करवाया. इस घटना के बाद दिशोम गुरु शिबू सोरेन फादर एंथोनी मुर्मू की पत्नी बिबियाना बास्की से मिलने उनके घर पहुंचे थे. शिबू सोरेन ने घटना की पूरी जानकारी ली और हक दिलाने का आश्वासन दिया. इतिहास के पन्नों से गायब हो गये शहीद इस गोलीकांड में मारे गये संतालों के परिजनों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा. सरकार की ओर से सिर्फ पांच-पांच हजार रुपये का मुआवजा दिया गया. कुछ परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गयी कि फायरिंग में मारे गये संतालों की विधवाओं को परिवार चलाने के लिए मजबूरी में दूसरी शादी करनी पड़ी. शहादत देने वाले ये संताल आज झारखंड आंदोलन के इतिहास के पन्नों से पूरी तरह गायब हो चुके हैं. आज स्मारक स्थल पर होगा कार्यक्रम, याद किये जायेंगे गोलीकांड के शहीद बांझी स्थित शहीद स्मारक और साबैया स्थित शहीद फादर एंथोनी मुर्मू मेमोरियल मध्य विद्यालय में आज आदिवासी समुदाय सादगी से शहीद दिवस मनायेगा. शहीद मीनार पर पूजा-अर्चना कर श्रद्धांजलि अर्पित की जायेगी. फादर एंथोनी मुर्मू के बेटे क्लाइमेंट मुर्मू ने बताया कि कार्यक्रम की तैयारी पूरी हो गयी है. इस मौके पर राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं एवं प्रबुद्धजनों का आगमन होगा और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा.
80 गोलियों से दबायी गयी आदिवासियों की आवाज, इंसाफ का अब भी इंतजार
बांझी कांड के 41 साल पूरे, फायरिंग में पूर्व सांसद फादर एंथोनी मुर्मू सहित 15 संताल हुए थे शहीद

साहिबगंज (फाइल फोटो)