तीन सूत्री मांग को लेकर कांग्रेसियों ने दिया धरना

संवाददाता, साहिबगंजभूमि अधिग्रहण कानून सहित अन्य मुद्दों को लेकर गुरुवार को समाहरणालय के निकट कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक दिवसीय धरना दिया. इसका नेतृत्व अनुकूल चंद्र मिश्रा ने किया. राष्ट्रीय महिला आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मंजु हेंब्रम ने कहा कि भाजपा नीत की सरकार किसान की जमीन की हड़पना चाह रही है. ऐसा नहीं होने दिया […]

संवाददाता, साहिबगंजभूमि अधिग्रहण कानून सहित अन्य मुद्दों को लेकर गुरुवार को समाहरणालय के निकट कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक दिवसीय धरना दिया. इसका नेतृत्व अनुकूल चंद्र मिश्रा ने किया. राष्ट्रीय महिला आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मंजु हेंब्रम ने कहा कि भाजपा नीत की सरकार किसान की जमीन की हड़पना चाह रही है. ऐसा नहीं होने दिया जायेगा. धरना के बाद राष्ट्रपति व राज्यपाल के नाम ज्ञापन डीसी उमेश प्रसाद सिंह को ज्ञापन सौंपा गया. इस अवसर पर जिला उपाध्यक्ष नीलू तिवारी, महासचिव मुर्शाद अली, अनिल ओझा, ए पासवान, कौशिक विश्वास, डॉ विमल द ेव भगत, विरेन्न्र साह, एकलाख नदीम, अरविंद यादव, धर्मेन्न्र सिंह, ललन ठाकुर, राजेश चौधरी, ब्रजेश झा, संजय ओझा, सद्दाम आदि थे……….फोटो नं 12 एसबीजी 2 हैं.कैप्सन: गुरूवार को समाहरणालय के निकट धरना देते कांग्रेसी नेतागण

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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