ओके ::::::: नमामि गंगे प्रोजेक्ट के पांच दिवसीय प्रशिक्षण का तीसरा दिन

खुले में शौच करने से होने वाले नुकसान के बारे में ग्रामीणों को किया जागरूकफोटो नं 12 एसबीजी 17 है.कैप्सन: गुरूवार को प्रशिक्षण मे उपस्थित लोग15 अप्रैल तक सरकार के सहयोग से बनावा लेंगे शौचालय : ग्रामीणनगर प्रतिनिधि, साहिबगंज नमामि गंगे प्रोजेक्ट को सफल बनाने को लेकर शहर के निर्माया सिनेमा हॉल परिसर में आयोजित […]

खुले में शौच करने से होने वाले नुकसान के बारे में ग्रामीणों को किया जागरूकफोटो नं 12 एसबीजी 17 है.कैप्सन: गुरूवार को प्रशिक्षण मे उपस्थित लोग15 अप्रैल तक सरकार के सहयोग से बनावा लेंगे शौचालय : ग्रामीणनगर प्रतिनिधि, साहिबगंज नमामि गंगे प्रोजेक्ट को सफल बनाने को लेकर शहर के निर्माया सिनेमा हॉल परिसर में आयोजित पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के तीसरे दिन सदर प्रखंड के 13 गांव के लोगों को खुले में शौच करने से होने वाले नुकसान की जानकारी दी. साथ ही स्वच्छता व गंगा तट को स्वच्छ रखने के बारे में बताया गया. वहीं द्वितीय पाली में टीम के सदस्यों ने 23 गांव में जाकर लोगों को घर में शौचालय बनाने की बात कही. मौके पर फीड बैक संस्था के एके सिन्हा अतिथि के शशिभूषण, सुबोध, अफजल काजमी, राजेश सिंह सहित 33 पंचायत के मुखिया, जल सहिया व उत्प्रेरक उपस्थित थे.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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