ओके ::::: तीन दिवसीय सामुदायिक विकास प्रशिक्षण शुरू

फोटों नं 11 एसबीजी 9,10 हैं.कैप्सन: बुधवार को कार्यक्रम को संबोधित करते मुख्य अतिथिउपस्थित एनवाइके के सदस्यगण संवाददाता, साहिबगंज शहर के फ्रेेंडस क्लब में बुधवार से तीन दिवसीय युवा नेतृत्व एवं सामुदायिक विकास प्रशिक्षण का शुभारंभ केंद्र के समन्वयक बलराम दास ने द्वीप प्रज्वलित कर किया. प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य युवाओं में नेतृत्व की भावना […]

फोटों नं 11 एसबीजी 9,10 हैं.कैप्सन: बुधवार को कार्यक्रम को संबोधित करते मुख्य अतिथिउपस्थित एनवाइके के सदस्यगण संवाददाता, साहिबगंज शहर के फ्रेेंडस क्लब में बुधवार से तीन दिवसीय युवा नेतृत्व एवं सामुदायिक विकास प्रशिक्षण का शुभारंभ केंद्र के समन्वयक बलराम दास ने द्वीप प्रज्वलित कर किया. प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य युवाओं में नेतृत्व की भावना पैदा करना तथा उसे समुदाय के विकास में लगान आदि पर प्रशिक्षण दिया गया. वहीं केंद्र समन्वयक बलराम दास ने कार्यक्रम की गतिविधि की जानकारी दी. अवसर पर दीप स्तंभ के अध्यक्ष सरिता देवी, सचिव रबीना मिश्रा, एनसीसी के अवधेश यादव, पूनम कुमारी सहित कई सदस्य उपस्थित थे.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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