ओके::छात्र-छात्राओं को दी गयी बाल संरक्षण की जानकारी

साहिबगंज. डीसी उमेश प्रसाद सिंह के निर्देशानुसार बाल संरक्षण पदाधिकारी पूनम कुमारी व विधिक पदाधिकारी राजीव कुमार ने संयुक्त रूप से मंगलवार को यमुना दास चौधरी बालिका उच्च विद्यालय, आदर्श कन्या उत्क्रमित उच्च विद्यालय में जागरूकता शिविर के तहत छात्राओं के बीच निबंध, लेखन, स्लोगन, प्रतियोगिता का आयोजन कराया. प्रतियोगिता में सफल प्रतिभागियों के बीच […]

साहिबगंज. डीसी उमेश प्रसाद सिंह के निर्देशानुसार बाल संरक्षण पदाधिकारी पूनम कुमारी व विधिक पदाधिकारी राजीव कुमार ने संयुक्त रूप से मंगलवार को यमुना दास चौधरी बालिका उच्च विद्यालय, आदर्श कन्या उत्क्रमित उच्च विद्यालय में जागरूकता शिविर के तहत छात्राओं के बीच निबंध, लेखन, स्लोगन, प्रतियोगिता का आयोजन कराया. प्रतियोगिता में सफल प्रतिभागियों के बीच पुरस्कार का वितरण किया गया. वहीं छात्र-छात्राओं को बाल विवाह कानून, बाल व्यापार, बाल अधिकार अधिनियम व बच्चों के अधिकारों की जानकारी दी गयी. मौके पर विद्यालय के शिक्षक, शिक्षिकाओं के अलावे सैकड़ों छात्राएं उपस्थित थे.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

कैसा लग रहा सर” कह ग्रामीणों ने डीसी को दिखायी जर्जर सड़क

साहिबगंज के लाल अमन ने किया कमाल, आईएफएस में 27 रैंक लाकर किया नाम रौशन

टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

गंगा नदी में डॉल्फिन संरक्षण को लेकर दिया प्रशिक्षण

यह भी पढ़ें >