अब शहर का गंदा पानी स्वच्छ होकर मिलेगा गंगा में

फोटो नं 10 एसबीजी 18 हैं.कैप्सन: मंगलवार को जानकारी देते पदाधिकारी प्रतिनिधि, साहिबगंज गंगा में मिलने वाली शहर की नालियों का पानी अब स्वच्छ होकर गंगा में मिलेगा. इसके लिए नगर विकास विभाग की ओर से कवायद शुरू कर दी गई है. मंगलवार को शहर के ब्रह्म स्थान घाट का निरीक्षण कर रहे नगर विकास […]

फोटो नं 10 एसबीजी 18 हैं.कैप्सन: मंगलवार को जानकारी देते पदाधिकारी प्रतिनिधि, साहिबगंज गंगा में मिलने वाली शहर की नालियों का पानी अब स्वच्छ होकर गंगा में मिलेगा. इसके लिए नगर विकास विभाग की ओर से कवायद शुरू कर दी गई है. मंगलवार को शहर के ब्रह्म स्थान घाट का निरीक्षण कर रहे नगर विकास सचिव अजय कुमार सिंह व भवन प्रमंडल विभाग के प्रधान सचिव सुखदेव सिंह ने ब्रह्म स्थान घाट पर शहर का गंदा पानी पहुंचते देखकर कहा कि नमामि गंगे योजना तहत अंडरग्राउंड सिवरेज सिस्टम के तहत नालों के पानी को स्वच्छ कर गंगा में मिलाया जायेगा. ताकि शहर से निकलने वाले हजारों लीटर पानी दोबारा शुद्ध होकर उपयोग में आ सके. इसके लिए फिर से डीपीआर बनाया जायेगा. यह योजना करीब सौ करोड़ से भी अधिक के लागत की होगी. मौके पर टाटा कंपनी के कंसल्टेंट सुनील भास्करन, एस कुमार, डीसी उमेश प्रसाद सिंह, एसपी सुनील भास्कर, अपर समाहर्ता निरंजन कुमार, एसडीओ जीतेंद्र देव, जिला योजना पदाधिकारी रामनिवास सिंह, डीएसओ जयप्रकाश झा समेत अन्य उपस्थित थे.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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