ओके::बोरियो में सोना संथाल समिति ने किया महिला जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

प्रतिनिधि, बोरियो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर सोमवार को सोना संथाल समाज समिति के बैनर तले महिला जागरूकता एवं अधिकार पर कार्यक्रम का आयोजन हुआ. इसके पूर्व दामिन डाक बंगला से महिला जागरूकता रैली निकाली गयी. जो बोरियो, नमस्ते रोड, यादव चौक होते हुए बोरियो प्रखंड परिसर मैदान पहुंची. कार्यक्रम की अध्यक्षता रोशलीन हांसदा […]

प्रतिनिधि, बोरियो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर सोमवार को सोना संथाल समाज समिति के बैनर तले महिला जागरूकता एवं अधिकार पर कार्यक्रम का आयोजन हुआ. इसके पूर्व दामिन डाक बंगला से महिला जागरूकता रैली निकाली गयी. जो बोरियो, नमस्ते रोड, यादव चौक होते हुए बोरियो प्रखंड परिसर मैदान पहुंची. कार्यक्रम की अध्यक्षता रोशलीन हांसदा ने की. मुख्य अतिथि देरोनिका बास्की व एशीला ने संयुक्त रूप से द्वीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की. मौके पर समिति के अध्यक्ष पप्पू टुडू ने सभा को संबोधित करते हुए महिला सशक्तीकरण के बारे में बताया. फादर टोम ने भूमि अधिग्रहण, जल, जंगल, जमीन के बारे में बताया. इस मौके पर किस्टर रंजना, ऐलिजाबेथ किस्कू, संजू हांसदा, वीरेंद्र मुर्मू सहित अन्य उपस्थित थे. ————————————————————————फोटों नं 9 एसबीजी 12 हैं.कैप्सन: सोमवार को जागरूकता कार्यक्रम को संबोधित करते मुख्य अतिथि

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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