ओके::मानदेय लागू करने को लेकर कृषक मित्रों ने डीसी को सीएम के नाम सौंपा ज्ञापन

संवाददाता, साहिबगंजजिला कृषक मित्र संघ के अध्यक्ष खूबलाल पंडित, प्रभारी विपिन बिहारी ने शुक्रवार को डीसी उमेश प्रसाद सिंह से मिल कर मुख्यमंत्री, परियोजना निदेशक आत्मा के नाम मानदेय लागू करने को लेकर ज्ञापन सौंपा है. ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि कृषक मित्रों का चयन हुए चार वर्ष बीत चुके हैं. द्वितीय हरित […]

संवाददाता, साहिबगंजजिला कृषक मित्र संघ के अध्यक्ष खूबलाल पंडित, प्रभारी विपिन बिहारी ने शुक्रवार को डीसी उमेश प्रसाद सिंह से मिल कर मुख्यमंत्री, परियोजना निदेशक आत्मा के नाम मानदेय लागू करने को लेकर ज्ञापन सौंपा है. ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि कृषक मित्रों का चयन हुए चार वर्ष बीत चुके हैं. द्वितीय हरित क्रांति के तहत राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में दिन-रात काम कर रहे हैं. कृषि की नयी तकनीक एसडब्ल्यूआइ पद्धति हो या पारंपरिक कृषि पद्धति हो. कृषि यंत्र, पशु गणना, खाद वितरण, बीज वितरण, किसानों के केसीसी दिलाने जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य कृषक मित्र करते आ रहे हैं. लेकिन आज तक अनुबंध कर्मियों को मानदेय नहीं मिला है. इसके विरोध में रांची में अनशन चल रहा है. कृषक मित्रों ने दो सूत्री मांग न्यूनतम मजदूरी के बराबर मानदेय लागू करने, कृषक मित्रों को स्थायीकरण करने की मांग की है. इस मौके पर विनोद साह, दुर्गा ठाकुर, जगत किशोर राम, अशोक ठाकुर, नयन ठाकुर, अनिल शर्मा, अजीत शर्मा, अलाउद्दीन अंसारी, अजीत मड़ैया आदि उपस्थित थे.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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