ओके... अग्निशमन विभाग विद्यालय परिसर में किया गया मॉक पोल

– बच्चों को दी गयी आग से बचाव की जानकारीनगर प्रतिनिधि, साहिबगंजमंगलवार को हबीबपुर स्थित केंद्रीय विद्यालय परिसर में अग्नि शमन विभाग द्वारा मॉक पोल किया गया. प्रधान अग्निचालक ब्रजकिशोर पासवान ने फायर शील्ड के एबीसी व डीसीपी यंत्र के बारे में जानकारी दी. विद्यालय परिसर में ही कागज में आग लगा कर एबीसी यंत्र […]

– बच्चों को दी गयी आग से बचाव की जानकारीनगर प्रतिनिधि, साहिबगंजमंगलवार को हबीबपुर स्थित केंद्रीय विद्यालय परिसर में अग्नि शमन विभाग द्वारा मॉक पोल किया गया. प्रधान अग्निचालक ब्रजकिशोर पासवान ने फायर शील्ड के एबीसी व डीसीपी यंत्र के बारे में जानकारी दी. विद्यालय परिसर में ही कागज में आग लगा कर एबीसी यंत्र से उसे नियंत्रित कर दिखाया. श्री पासवान ने बताया कि लकड़ी, कपड़ा व साधारण आग पर एबीसी यंत्र व तरल पदार्थ, इलेक्ट्रिक की आग पर डाय केमिकल पाउडर से काबू किया जाता है. बच्चों को आग लगने की स्थिति में शोर नहीं करने, स्थिर होने व एक जगह पर जमा होने की बात कही. मौके पर अग्नि शमन विभाग के चालक मो मंजूर आलम, अविनाश कुमार, विद्यालय के प्रधानाध्यापक जीवन वर्मा पीके मिश्रा, अजय भगत, रवींद्र कुमार, विकास पारिख, विनय कुमार, गीता उपस्थित थे. …………………..फोटों नं 24 एसबीजी 8,9 हैं.कैप्सन: मंगलवार को मॉक पोल के जानकारी देते अग्निशमन पदाधिकारीउपस्थित छात्र छात्राएं

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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