ओके... सामाजिक उत्थान को लेकर झारखंड वेलफेयर फाउंडेशन गठित

प्रतिनिधि, साहिबगंजशहर के एलसी रोड स्थित मदरसा अजीजिया में मंगलवार को सामाजिक उत्थान के लिए एक कमेटी गठन को लेकर बैठक हुई. बैठक की अध्यक्षता जामा मसजिद के पेशइमाम मुफ्ती अंजर हुसैन कासमी ने की. इस दौरान सर्वसम्मति से सामाजिक उत्थान के लिए झारखंड वेलफेयर फाउंडेशन का गठन किया गया है. बैठक में निर्णय लिया […]

प्रतिनिधि, साहिबगंजशहर के एलसी रोड स्थित मदरसा अजीजिया में मंगलवार को सामाजिक उत्थान के लिए एक कमेटी गठन को लेकर बैठक हुई. बैठक की अध्यक्षता जामा मसजिद के पेशइमाम मुफ्ती अंजर हुसैन कासमी ने की. इस दौरान सर्वसम्मति से सामाजिक उत्थान के लिए झारखंड वेलफेयर फाउंडेशन का गठन किया गया है. बैठक में निर्णय लिया गया कि इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों को खत्म कर लोगों के उत्थान में काम करना है. इसके अलावे कमेटी मातृभाषा उर्दू व हिंदी के उत्थान के लिए कोशिश करेगी. वहीं समाज के हर बच्चों को शिक्षा का अधिकार से जोड़ने, नौजवानों को रोजगार से दिलाने, स्कील डेवलपमेंट प्रोग्राम पर जोर दिया जायेगा. फाउंडेशन की अगली बैठक 27 फरवरी को दोपहर में मदरसा अजीतिया में होगा. मौके पर नपा के पूर्व उपाध्यक्ष अनवल अली, रियाजुद्दीन, डा तुफैल अहमद, शमशाद आलम, शाहिद इकबाल, सरफराज आलम, तौकीर राज, डॉ मुसर्रफ, मो नाजीर, मो सालीम, मास्टर काशिम, मो जाकिर, मो इब्राहीम, मो जाहिद, मो अरशद उपस्थित थे. ………………………………..फोटो नंबर 24 एसबीजी 3 हैकैप्सन: मंगलवार को बैठक करते झारखंड वेलफेयर फाउंडेशन के सदस्य व अन्य

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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