प्रदर्शनी का डीडीसी ने किया उदघाटन, कहा

प्रतिनिधि, साहिबगंज टाउन हॉल में सोमवार को खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की ओर से प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत जिलास्तरीय प्रदर्शनी का आयोजन किया गया. इसका उदघाटन डीडीसी मुकुंद दास ने किया. उन्होंने बताया कि पीएमइजीपी के तहत बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने का यह बेहतर विकल्प है. इसमें बेरोजगारों को रोजगार करने के […]

प्रतिनिधि, साहिबगंज टाउन हॉल में सोमवार को खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की ओर से प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत जिलास्तरीय प्रदर्शनी का आयोजन किया गया. इसका उदघाटन डीडीसी मुकुंद दास ने किया. उन्होंने बताया कि पीएमइजीपी के तहत बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने का यह बेहतर विकल्प है. इसमें बेरोजगारों को रोजगार करने के लिए 20 लाख से अधिक का ऋण दिया जाता है. कार्यक्रम का संचालन जीएम विधेश्वरी दास ने किया. इस अवसर पर इडीपी ट्रेनिंग सेंटर देवघर के राजीव रंजन, गोड्डा के आशुतोष झा, विनय कुमार, रामजी दास, विमल कुमार, मो बशीर आदि थे.प्रदर्शनी में लगे थे 10 स्टॉलजिला स्तरीय प्रदर्शनी में करीब 10 स्टॉल लगाये गये थे. इसमें एक्वा पीना मिनरल वॉटर प्लांट, गारमेंट, ऊनी कपड़े, आचार फैक्टरी, सिल्क कपड़े समेत 10 स्टॉल थे………….फोटो नंबर 23 एसबीजी 9 व 7 हैकैप्सन: सोमवार को जिला स्तरीय प्रदर्शनी को संबोधित करते जीएम व अन्य प्रदर्शनी में लगी स्टॉल .

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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