सरकार बंगला भाषा को दे उचित सम्मान : कन्हाई

अंतरराष्ट्रीय मातृ भाष दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन नगर प्रतिनिधि, साहिबगंजझारखंड सरकार द्वितीय मातृ भाष बंगला को उचित सम्मान दे. यह बातें बंगला भाषा के लेखक कन्हाई लाल सरकार ने रविवार को रेलवे जेनरल इंस्टीट्यूट में झारखंड बंगाली समिति द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस कार्यक्रम में कही. उन्होंने कहा कि झारखंड राज्य में बंगला […]

अंतरराष्ट्रीय मातृ भाष दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन नगर प्रतिनिधि, साहिबगंजझारखंड सरकार द्वितीय मातृ भाष बंगला को उचित सम्मान दे. यह बातें बंगला भाषा के लेखक कन्हाई लाल सरकार ने रविवार को रेलवे जेनरल इंस्टीट्यूट में झारखंड बंगाली समिति द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस कार्यक्रम में कही. उन्होंने कहा कि झारखंड राज्य में बंगला भाषा को द्वितीय राजभाषा का प्राप्त होने के बावजूद उचित सम्मान नहीं दिया जा रहा है. यह खेद का विषय है. इसके पूर्व अतिथियों ने द्वीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम क शुभारंभ किया. कार्यक्रम में अतिथियों को समिति के केंद्रीय संयोजक हिमांशु शेखर ने स्वागत किया. वहीं शबनम बनर्जी व चैताली राय चौधरी ने संगीत की प्रस्तुति दी. विप्लव राय चौधरी ने कविता प्रस्तुत किया. संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रो सोमनाथ सन्याल ने कहा कि बंगला भाषी सरकार से बंगला पुस्तकों की उपलब्धता हर वर्ष समय पर करने की मांग करता है. बंगला अनुवादकों की नियुक्ति हो, बंगला शिक्षकों की रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्ति हो व सरकारी कार्यालय, न्यायिक और प्रशासनिक विभागों में बंगला भाषा का प्रयोग सुनिश्चित किया जाये. इस अवसर पर सुदीप मित्रा, स्वान्तना पाल, कल्याण दे, शरत पोद्दार, काजल सरकार, मुन्ना ठाकुर, तुसार सिंह राय, विकास गुप्ता, हेमंत सिंह राय, अनुपशील, आशिष सरकार, सोमित्र चटर्जी, पार्थो साहा, संजय देव आदि थे…………..फोटो नं0 22 एसबीजी 6,7 हैकैप्सन- रविवार को मंचासिन अतिथिगणउपस्थित बंगलाभाषी

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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