जिला विकलांग संघर्ष समिति की बैठक

नयी समिति को मजबूत बनाने पर सहमतिनगर प्रतिनिधि, साहिबगंजरेलवे जेनरल इंस्टीट्यूट के मैदान में रविवार को जिला विकलांग संघर्ष समिति की बैठक जिला संयोजक युगल किशोर प्रसाद की अध्यक्षता में हुई. इस दौरान नयी समिति को मजबूत बनाने व नि:शक्तों को जोड़ने को लेकर चर्चा की गयी. जिला संयोजक श्री प्रसाद ने बताया कि समिति […]

नयी समिति को मजबूत बनाने पर सहमतिनगर प्रतिनिधि, साहिबगंजरेलवे जेनरल इंस्टीट्यूट के मैदान में रविवार को जिला विकलांग संघर्ष समिति की बैठक जिला संयोजक युगल किशोर प्रसाद की अध्यक्षता में हुई. इस दौरान नयी समिति को मजबूत बनाने व नि:शक्तों को जोड़ने को लेकर चर्चा की गयी. जिला संयोजक श्री प्रसाद ने बताया कि समिति की अगली बैठक 15 मार्च को होगी. इस अवसर पर रामखिलावन सिंह, विनोद कुमार तांती, विजय ठाकुर, कुमोद दास, केदार नाथ शर्मा, कुंदन कुमार, कासिफ अंसारी, धर्मेंद्र पांडे, अजय कुमार, चंदन कुमार, बसंत श्रीवास्तव, उषा चौधरी, राजेश यादव आदि थे…………..फोटो नं0 22 एसबीजी 5 हैकैप्सन- रविवार को बैठक करते समिति के सदस्यगण

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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