ओके::फ्लैग-नवजात शिशु सुरक्षा पर आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रममें डॉ महमूद ने कहा

–एएनएम को दी गयी विस्तार पूर्वक जानकारीनगर प्रतिनिधि, साहिबगंज नवजात शिशु सुरक्षा पर आयोजित प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य शिशु मृत्यु दर को रोकना है. यह बातें डॉ महमूद आलम ने शनिवार को सदर अस्पताल परिसर स्थित एएनएम ट्रेनिंग सेंटर में नवजात शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण के अंतिम दिन उपस्थित एएनएम […]

–एएनएम को दी गयी विस्तार पूर्वक जानकारीनगर प्रतिनिधि, साहिबगंज नवजात शिशु सुरक्षा पर आयोजित प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य शिशु मृत्यु दर को रोकना है. यह बातें डॉ महमूद आलम ने शनिवार को सदर अस्पताल परिसर स्थित एएनएम ट्रेनिंग सेंटर में नवजात शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण के अंतिम दिन उपस्थित एएनएम से कही. उन्होंने कहा कि शिशु मृत्यु दर को रोकना हम सभी की जिम्मेवारी है. इसके लिए विभाग द्वारा समय-समय पर प्रशिक्षण का भी आयोजन किया जाता है. प्रशिक्षण के अंतिम दिन प्रशिक्षक डॉ आलम, डॉ मोहन पासवान, डॉ सुषमा वर्मा द्वारा उपस्थित प्रशिक्षु एएनएम को विस्तार पूर्वक जानकारी दी. मौके पर प्रशिक्षक के अलावे बरहरवा, बोरियो, बरहेट, मंडरो प्रखंड के दर्जनों एएनएम उपस्थित थी. ——————————————————————————————–फोटों नं 21 एसबीजी 4,5 हैं.कैप्सन: शनिवार को कार्यक्रम को संबोधित करते डॉ महमूद आलमउपस्थित नर्स

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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