ओके... ममता वाहन ऑनर एसोसिएशन की बैठक

– सरकार के फैसले पर जतायी नाराजगीसाहिबगंज . ममता वाहन ऑनर एसोसिएशन की बैठक गुरुवार को हुई. जिसमें अध्यक्ष अनंत मोहन यादव व सचिव अमरेंद्र कुमार तिवारी को बनाया गया. बैठक में सरकार द्वारा ममता वाहन को निर्धारित किलोमीटर पर भुगतान न कर जो कि छह किलोमीटर पर 300 उसके बाद नौ रुपये प्रति किमी […]

– सरकार के फैसले पर जतायी नाराजगीसाहिबगंज . ममता वाहन ऑनर एसोसिएशन की बैठक गुरुवार को हुई. जिसमें अध्यक्ष अनंत मोहन यादव व सचिव अमरेंद्र कुमार तिवारी को बनाया गया. बैठक में सरकार द्वारा ममता वाहन को निर्धारित किलोमीटर पर भुगतान न कर जो कि छह किलोमीटर पर 300 उसके बाद नौ रुपये प्रति किमी पर था उसको घटा कर मात्र 250 रुपया कर दिया गया है. जिसको लेकर सभी ममता वाहन ऑनरों ने विरोध जताया है. एसोसिएशन ने कहा कि चार दिनों के अंदर सरकार द्वारा फैसला वापस नहीं लेने पर जिले भर में सेवा बंद कर दिया जायेगा. साथ ही सरकार के विरोध में धरना-प्रदर्शन की जायेगी. जिसमें सर्वसम्मति से उपाध्यक्ष रॉबिन साह को बरहेट, अर्जुन रजक को बोरियो, जनमैजम ओझा को मंडरो, गुड्डू भगत को बरहरवा, अनिल शर्मा को राजमहल, नइम आलम को उधवा, मनोज भगत को तालझारी, सुनील यादव को साहिबगंज, नवीन कुमार, शाहरूख को पतना का उपाध्यक्ष बनाया गया. अमरेंद्र तिवारी को जिला सचिव तथा मधुकर आनंद को कोषाध्यक्ष बनाया गया.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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