ओके::जिले में सुकन्या योजना के तहत डाकघरों में खुलने लगे खाते

-पहले दिन 822 बच्चियों का खुला खाता -31 मार्च तक 25 हजार खाता खोलने का लक्ष्यप्रतिनिधि, साहिबगंजजिले में वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग की ओर से संचालित सुकन्या योजना शुरू हो गयी. इसके तहत जिले के सभी डाकघरों में 10 वर्ष तक की बच्चियों का खाता खुलने लगा है. डाक विभाग के निरीक्षक एस […]

-पहले दिन 822 बच्चियों का खुला खाता -31 मार्च तक 25 हजार खाता खोलने का लक्ष्यप्रतिनिधि, साहिबगंजजिले में वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग की ओर से संचालित सुकन्या योजना शुरू हो गयी. इसके तहत जिले के सभी डाकघरों में 10 वर्ष तक की बच्चियों का खाता खुलने लगा है. डाक विभाग के निरीक्षक एस के सिंह ने बताया कि पहले दिन योजना के तहत 822 खाता खोले गये. जिले की जो भी बच्चियां वर्ष 2003 के बाद जन्म ली हैं, उनका खाता खोला जा रहा है. अभिभावक उनके नाम से खाता खोलेंगे. खाता खोलने के लिए कम से कम एक हजार रुपये होने चाहिए. इस खाता पर 9.1 फीसदी की दर से ब्याज दिया जायेगा. यदि किसी अभिभावक के पास ज्यादा पैसा जमा करने की क्षमता है तो बच्ची के नाम से अधिकतम डेढ़ लाख रुपये सौ रुपये के गुणक में जमा कर सकते हैं. खाता खुलने के दिन से 18 वर्ष तक राशि जमा होगी. 14 साल के बाद खाते से 50 फीसदी राशि निकाली जा सकती है. नियम के अनुसार बच्ची के बालिग होने पर वही राशि निकाल सकेगी. शादी होने या अधिकतम 21 साल की उम्र होने तक ही खाता संचालित हो सकेगा. जिले के सभी शाखाओं में 31 मार्च तक योजना से 25 हजार खाता खोलने का लक्ष्य रखा गया है. चितरंजन मंडल ने दिया योगदानडाक निरीक्षक ने बताया कि साहिबगंज के मुख्य डाकघर में पोस्ट मास्टर के रूप में चितरंजन मंडल ने योगदान कर लिया है. इससे पूर्व श्री मंडल मिर्जाचौकी डाकघर में कार्यरत थे. जबकि साहिबगंज में फ्रीडा टुडू पोस्ट मास्टर थी.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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