ओके....1988 परीक्षार्थियों ने दी इंटर की परीक्षा

साहिबगंज/बोरियो/बरहरवा/राजमहल/बरहेट . साहिबगंज जिले में सोमवार से शुरू हुए इंटर की परीक्षा कदाचारमुक्त वातावरण में नौ केंद्रों पर हुई. प्रथम दिन इंटर में 1988 परीक्षार्थी में 1939 परीक्षार्थी सोशियोलॉजी व जुलॉजी की परीक्षा दी. जिसमें 49 परीक्षार्थी अनुपस्थित रहे. मिली जानकारी के अनुसार राजस्थान इंटर विद्यालय 107 में 103, साहिबगंज महाविद्यालय में 222 में 217, […]

साहिबगंज/बोरियो/बरहरवा/राजमहल/बरहेट . साहिबगंज जिले में सोमवार से शुरू हुए इंटर की परीक्षा कदाचारमुक्त वातावरण में नौ केंद्रों पर हुई. प्रथम दिन इंटर में 1988 परीक्षार्थी में 1939 परीक्षार्थी सोशियोलॉजी व जुलॉजी की परीक्षा दी. जिसमें 49 परीक्षार्थी अनुपस्थित रहे. मिली जानकारी के अनुसार राजस्थान इंटर विद्यालय 107 में 103, साहिबगंज महाविद्यालय में 222 में 217, संध्या महाविद्यालय में 66 में 64, प्लस टू जेके उच्च विद्यालय राजमहल में 771 में 757, प्रोजेक्ट कन्या उच्च विद्यालय राजमहल में 291 में 285, उत्क्रमित प्लस टू उच्च विद्यालय बरहरवा में 66 में 66, एनडीएम बालिका उच्च विद्यालय बरहरवा में 291 में 284, आरके प्लस टू उच्च विद्यालय बोरियो में 142 में 121, आदर्श कन्या उत्क्रमित उच्च विद्यालय बरहेट में 32 में 32 परीक्षार्थी शामिल हुए. जबकि 49 परीक्षार्थी अनुपस्थित रहे.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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