ओके ::: पत्थर खदानों में सुरक्षा मानकों का हो रहा नजरअंदाज

प्रतिनिधि, साहिबगंजजिले के अधिकांश पत्थर खदानों में मजदूरों की जान से खिलवाड़ किया जाता है. मजदूरों को सुरक्षा मानकों को नजर अंदाज कर खनन का काम कराया जाता है. लिहाजा आये दिन पत्थर खादानों में काम करते मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ती है. बीते शुक्रवार की दोपहर मिर्जाचौकी के भुताहा पहाड़ स्थित चार नंबर […]

प्रतिनिधि, साहिबगंजजिले के अधिकांश पत्थर खदानों में मजदूरों की जान से खिलवाड़ किया जाता है. मजदूरों को सुरक्षा मानकों को नजर अंदाज कर खनन का काम कराया जाता है. लिहाजा आये दिन पत्थर खादानों में काम करते मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ती है. बीते शुक्रवार की दोपहर मिर्जाचौकी के भुताहा पहाड़ स्थित चार नंबर खादान में पत्थर खादान में धंसान होने से पोकलेन के ड्राइवर अजय कुमार की मौत हो गयी. दरअसल, खादानों में सुरक्षा मानक के अनुसार काम करने वाले मजदूरों को कई सुरक्षा के सामान देने का नियम है. लेकिन पत्थर खादान के मालिक के द्वारा कोई सामान नहीं दिया जाता है.मजदूरों को सुरक्षा के लिए देना है यह सामानपत्थर खादान में काम करने वाले मजदूरों को हेलमेट, चश्मा, मास्क, ग्लब्स इत्यादि सामान मुहैया कराना है. इसके अलावा मजदूरों को गुड़ व चना भी खिलाने का नियम है. लेकिन कोई पत्थर खादान के मालिक यह सामान नहीं देते हैं.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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