ओके::फ्लैग-समीक्षा बैठक में सीएस ने कहा

-मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की कार्य योजना तैयार की गयीनगर प्रतिनिधि, साहिबगंजमरीजों को गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराएं. यह बातें सीएस डॉ बी मरांडी ने शुक्रवार को सदर अस्पताल के सभा कक्ष में आयोजित समीक्षा बैठक में उपस्थित चिकित्सकों, एलटी व एएनएम से कही. उन्होंने कहा कि मरीजों को अच्छी से अच्छी स्वास्थ्य […]

-मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की कार्य योजना तैयार की गयीनगर प्रतिनिधि, साहिबगंजमरीजों को गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराएं. यह बातें सीएस डॉ बी मरांडी ने शुक्रवार को सदर अस्पताल के सभा कक्ष में आयोजित समीक्षा बैठक में उपस्थित चिकित्सकों, एलटी व एएनएम से कही. उन्होंने कहा कि मरीजों को अच्छी से अच्छी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराना हम सभी की जिम्मेवारी है. बैठक में उपस्थित चिकित्सक, ए ग्रेड नर्स, एएनएम, एलटी को मरीजों को दी जाने वाली बेहतर सुविधा की जानकारी सीएस डॉ बी मरांडी, डीटीओ डॉ पीपी पांडे, डीआइसी अमीस्ट प्रोजेक्ट निलांशु कुमार द्वारा संयुक्त रूप से दी गयी. साथ ही मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की कार्य योजना तैयार की गयी. मौके पर सीएस डॉ बी मरांडी, डीटीओ डॉ पीपी पांडे, डीआइसी अमीस्ट प्रोजेक्ट निलांशु कुमार, डॉ रोशन खालको सहित ए ग्रेड नर्स, एएनएम, एलटी आदि उपस्थित थे. —————————–फोटों नं 13 एसबीजी 11 हैं.कैप्सन: शुक्रवार को बैठक में उपस्थित सीएस व अन्य

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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