प्रेम-प्रसंग के चलते मिली डांट से थी नाराज

साहिबगंज : डरो प्रखंड के बड़ा बेतौना गांव में नौवीं कक्षा की आदिवासी छात्र पौलिना सोरेन ने आत्महत्या कर ली. गुरुवार को उसका शव एक कुआं से बाहर निकाला गया. आत्महत्या की वजह प्रेम प्रसंग को लेकर परिजनों द्वारा लगायी गयी डांट फटकार को माना जा रहा है. छात्र पौलिना सोरेन के पिता सूरज सोरेन […]

साहिबगंज : डरो प्रखंड के बड़ा बेतौना गांव में नौवीं कक्षा की आदिवासी छात्र पौलिना सोरेन ने आत्महत्या कर ली. गुरुवार को उसका शव एक कुआं से बाहर निकाला गया. आत्महत्या की वजह प्रेम प्रसंग को लेकर परिजनों द्वारा लगायी गयी डांट फटकार को माना जा रहा है. छात्र पौलिना सोरेन के पिता सूरज सोरेन ने बताया कि रविवार की रात से पौलिना घर से गायब थी.
अपने रिश्तेदार के यहां महाराजपुर, तालझारी व अन्य जगहों पर खोजबीन की, लेकिन उसका पता नहीं चला. गुरुवार को सुबह 10 बजे गांव ही एक कुएं में उसका शव मिला. परिजनों ने इसकी सूचना तुरंत जिरवाबाड़ी ओपी पुलिस को दी. पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिये भेज दिया. इधर, जिरवाबाड़ी ओपी प्रभारी राजेंद्र दास ने बताया कि मृतका के पिता सूरज सोरेन के बयान पर यूडी केस दर्ज कर किया गया है. पुलिस मामले की छानबीन कर रही है.
रविवार को लगायी थी परिजनों ने डांट : रविवार को मृतका को एक युवक के साथ जिरवाबाड़ी ओपी पुलिस ने पकड़ा था. इसके बाद उनके परिजनों को सुपुर्द कर दिया था. बाद में परिजनों ने लड़की को डांट फटकार लगायी और लड़की को घर लाया. इसके बाद से वह घर से लापता हो गयी.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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