बाल श्रमिक विद्यालय के कर्मचारी शिक्षकों ने डीसी को सौंपा ज्ञापन

साहिबगंज . बाल श्रमिक विद्यालय के सभी शिक्षकेत्तर कर्मचारी को पिछले 15 महीने से वेतन नहीं मिलने पर मंगलवार को शिक्षकों ने डीसी से मिलकर वेतन भुगतान कराने की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा. सौंपे ज्ञापन में कहा है कि पिछले 15 महीने से वेतन नहीं मिल रहा है. जिससे कर्मचारियों के समक्ष भूखों मरने […]

साहिबगंज . बाल श्रमिक विद्यालय के सभी शिक्षकेत्तर कर्मचारी को पिछले 15 महीने से वेतन नहीं मिलने पर मंगलवार को शिक्षकों ने डीसी से मिलकर वेतन भुगतान कराने की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा. सौंपे ज्ञापन में कहा है कि पिछले 15 महीने से वेतन नहीं मिल रहा है. जिससे कर्मचारियों के समक्ष भूखों मरने की नौबत आ गयी है. कुछ कर्मचारी त्यागपत्र देने के लिये बाध्य हो रहे हैं. कर्ज लेकर बच्चों का पठन-पाठन व भोजन की व्यवस्था की जा रही है. मौके पर हरिभूषण, एके रजक, सुबोध पंडित, श्वेता कुमारी, दीपक कुमार सहित कई शिक्षकेत्तर कर्मचारी साथ में थे. डीसी ने बाल श्रम अधीक्षक से बात कर समस्या का निदान करने का आश्वासन दिया है.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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