लाखों का हाइमास्क लाईट वर्षो से बेकार

प्रतिनिधि, साहिबगंजसाहिबगंज शहर को सुंदर व चमकाने के उद्देश्य से वर्ष 2002 को राजमहल लोक सभा क्षेत्र के तत्कालीन सांसद थोमस हांसदा ने अपने सांसद निधि से शहर के गोपालपुल चौक, गांधी चौक, स्टेशन चौक, गोड़ाबाड़ी हाट, पूर्वी रेलवे फाटक, सुभाष चौक व लंच घाट पर हाई मास्क लाइट लगवाया है. जिसका उदघाटन 7 नवंबर […]

प्रतिनिधि, साहिबगंजसाहिबगंज शहर को सुंदर व चमकाने के उद्देश्य से वर्ष 2002 को राजमहल लोक सभा क्षेत्र के तत्कालीन सांसद थोमस हांसदा ने अपने सांसद निधि से शहर के गोपालपुल चौक, गांधी चौक, स्टेशन चौक, गोड़ाबाड़ी हाट, पूर्वी रेलवे फाटक, सुभाष चौक व लंच घाट पर हाई मास्क लाइट लगवाया है. जिसका उदघाटन 7 नवंबर 2002 को स्वयं सांसद थॉमस ने नारियल फोड़ कर किये था. मास्क लाइट एक दो वर्ष तक अपनी रोशनी से शहर को रोशन करता रहा, लेकिन दो वर्ष के बाद रख रखाव के अभाव में मास्क लाइट रोशनी देना बंद कर दिया. वर्र्तमान समय में शहर के सातों स्थानों पर लगे सभी मास्क लाइट खराब पड़ा है. इस ओर ना तो जिला प्रशासन ना ही नगर पर्षद द्वारा ध्यान दिया गया है. मास्क लाइट को यदि ठीक करा लिया जायेगा तो रात के अंधेरे में होनी आपराधिक घटना पर हद तक अंकुश लग जायेगा. क्योंकि मास्क लाइट से शहर की प्रमुख इलाकों में रोशनी रहती है.————————-फोटों नं 10 एसबीजी 7 हैं.कैप्सन: बंद पडा हाई मास्क लाईट शहर के सात स्थानो पर 2002 लगाया गया था सांसद निधि से हाई मास्क लाइट.

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टॉप बॉक्स :: : पुराने दिनों को याद कर छलक उठते हैं आंसूफोटो नं 09 एसबीजी 3 है कैप्सन - वृद्धाश्रम में रह रही वृद्ध महिलाएं.सुनील ठाकुर, साहिबगंजमदर्स डे पर प्रभात खबर ने साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित धोबी झरना के पास बने वृद्ध आश्रम में रह रही 9 वृद्ध माताओं का हाल-चाल जाना. वृद्ध आश्रम में 15 लोग हैं, जिनमें नौ महिला व छह पुरुष हैं. वहां रह रही अर्चना राय, शकुंतला देवी, उषा राय, नाचो मुर्मू, सुलमा किस्कू, बसंती देवी, गायत्री देवी, मोनिका देवी ने बताया कि लोग कहते हैं कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है. निश्चित रूप से यह बात गलत नहीं हो सकती क्योंकि धार्मिक किताब में भी लिखी हुई है. लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नहीं पा रहे हैं. यही कारण है कि बूढ़े मां-बाप को बच्चे बोझ समझते हैं. रिफ्यूजी कॉलोनी निवासी उषा राय ने बताया कि मदर्स डे पर सभी आते हैं लेकिन आखिर परिजन क्यों नहीं आते हैं. बरमसिया बरहेट निवासी सलमा किस्कू बताती हैं कि पहले हम लोग सुना करते थे कि बड़े-बड़े शहरों में शहर के लोग अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं पर अब आदिवासी लोगों को भी अपने मां-बाप भारी लगने लगे हैं. गायत्री देवी ने बताया कि यहां जिसे देखते हैं, मुझे लगता है कि सभी लोग हमारे परिवार हैं. अलग से हमारा भाई और रिश्तेदार क्यों मेरे से मिलने आयेगा? शहर व आसपास की ही महिलाएं यहां रह रहीं हैं. सबसे बड़ा दुख तब होता है जब बाजार से लोग सम्मानित करने आते हैं. मैं अपने परिजनों को देखने के लिए बेताब रहती हूं. उधवा की रहनेवाली अर्चना राय ने बताया कि मैं अपने परिजनों का नाम नहीं बताऊंगी, मुझे शर्म आती है. मेरे परिजन को शर्म नहीं आती है. पालन-पोषण कर बच्चों को बड़ा किया. आज हम बोझ बन गये हैं. शहर के कई समाजसेवी व संगठन के लोग मदर्स डे पर कार्यक्रम करने पहुंचेंगे.

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