बाबूलाल मरांडी के इस बयान का आदिवासी संगठनों ने किया विरोध, कहा- आरएसएस की बोली बोल रहे हैं

आदिवासियों के विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठनों की बैठक तेतर टोली मोराबादी में धर्मगुरु बंधन तिग्गा की अध्यक्षता में हुई.

रांची : आदिवासियों के विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठनों की बैठक तेतर टोली मोराबादी में धर्मगुरु बंधन तिग्गा की अध्यक्षता में हुई. इसमें राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बयान पर चर्चा हुई. इस पर डॉ करमा उरांव ने कहा कि हमलोग उनका सम्मान करते हैं, पर उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि वे विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के संगठन मंत्री रहे हैं. आज आदिवासी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और विहिप के साथ धर्मयुद्ध में हैं. ऐसे में हम उनसे और क्या उम्मीद कर सकते हैं?

बैठक में ये थे शामिल

इस बैठक में डॉ करमा उरांव, प्रेम शाही मुंडा, शि्वा कच्छप, अंतू तिर्की, संजय तिर्की, देवी दयाल मुंडा, कृष्णा मुंडा, मुन्ना टोप्पो, जयंत टोप्पो सहित राजी पाड़हा सरना प्रार्थना सभा, आदिवासी संघर्ष मोर्चा, आदिवासी जन परिषद, केंद्रीय सरना समिति, आदिवासी लोहरा समाज, जय आदिवासी केंद्रीय परिषद, झारखंड आदिवासी संयुक्त मोर्चा, आदिवासी सेना, आदिवासी छात्र संघ, केंद्रीय युवा सरना समिति, लोकत्रांतिक छात्र मोर्चा, आदिवासी भूमिज मुंडा समाज व बेदिया विकास परिषद सहित अन्य कई सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे.

आरएसएस की बोली बोल रहे हैं बाबूलाल मरांडी

रांची जिला के महापाहन शिबू पाहन, बड़ा घाघरा के चुकम पाहन, श्रीकांत पाहन, रोपना पाहन, अजय पाहन, देवानंद पाहन, जूरा पाहन, मंगरा पाहन, सुरेश,पाहन, विनद पाहन, सीता राम भगत, श्याम पाहन, विशेश्वर पाहन, बुधू पाहन और राजी पाड़हा सरना प्रार्थना सभा रांची जिला कार्यकारिणि व महिला प्रकोष्ठ रांची महानगर प्रकोष्ठ ने पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के उस बयान का कड़ा विरोध किया गया, जिसमें उन्होंने कहा है कि सरना, सनातन से जुड़ा है और आदिवासियों का राम से गहरा नाता है. शिबू तिग्गा ने कहा कि बाबूलाल मरांडी भाजपा में शामिल हो कर आरएसएस की बोली बोल रहे हैं, जबकि सरना और सनातन में जमीन-आसमान का अंतर है.

अलग है विधि-विधान

सरना समाज के पूजा स्थल, विधि-विधान, देवी, देवता और परंपराएं सनातन धर्म से अलग हैं. हमारे पूर्वज प्रकृती से सीधा संवाद करते थे और हम उसी की पूजा करते आ रहे हैं. जन्म से मरन तक हमारा हर नेग, सनातन से अलग है. चावल डुबो कर नाम रखा जाना, समाज प्रवेश में कनभेदी, पाहन और समाज द्वारा शादी संपन्न करना, दहेज प्रथा का नहीं होना, दक्षिण दिशा की ओर सिर रख शव दफनाना, आत्मा को घर में प्रवेश कराना, गांव-घर शुद्ध करना, शुभ काम शुरू और खत्म होने पर भेलवा फाडी विधि संपन्न करना जैसे कार्य होते हैं. हर पूजा स्थल में मुर्गी, पाठी, बकरे और अन्य पशुओं की बली दी जाती है.

posted by : sameer oraon

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