प्रतिनिधि, पिपरवार
पिपरवार क्षेत्र में एक्सावेशन की एचइएमएम मशीनें वर्तमान में भूली-बिसरी यादें बन कर रह गयी हैं. सर्वे ऑफ होने के बाद मशीनों के पूर्जे दूसरी कंपनियों में भेज दिये गये हैं या कबाड़ में जाने को तैयार है. इनपिट क्रशर मशीन की सहायक मशीन पीएंडएच-1, पीएंडएच-2, पीएंडएच-3 और बेल्ट बैगन सर्वे ऑफ के बाद पिपरवार खदान परिसर में खड़ी कर दी गयी है. इनमें से 20 क्विक मीटर की पीएंडएच-1 और 10 क्विक मीटर की क्षमता वाली पीएंडएच-2 व 3 शॉबेल मशीनों के पुर्जों को खोल कर कोल इंडिया की दूसरी कंपनियों में भेज दिये गये हैं, ऐसी मशीनों से काम लिया जा रहा है. लेकिन एशिया की पहली इनपिट क्रशर मशीन आज भी अपने सभी पुर्जों के साथ सही सलामत है. इसकी वजह यह है कि देश में इसके अलावा दूसरी मशीन है ही नहीं. इससे इनपिट क्रशर मशीन को कबाड़ के हाथों बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और न ही दूसरी जगह उपयोग की कोई संभावना है. पिपरवार परियोजना की मशीनें कभी देश की शान थी. कोयला उत्पादन के लिहाज से इन मशीनों की बदौलत पिपरवार को देश में गौरव प्राप्त होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. प्रोडक्शन मंथ में 24 घंटे में इन मशीनों ने 65 हजार टन तक कोयला उत्पादन का रेकाॅर्ड रहा है. जबकि इन मशीनों की क्षमता 28 हजार टन ही थी. तब पिपरवार परियोजना में लगभग एक किमी दायरे में कोयले का फेस हुआ करता था. फेस खत्म होते ही परियोजना खदान और एचइएमएम मशीनों की लाइफ खत्म होती गयी. अब ये मशीनें सिर्फ यादों में रह गयी है. वर्तमान जीएम संजीव कुमार छह वर्ष तक इन मशीनों के इंचार्ज रह चुके हैं.कोट
सभी मशीनें अपने लाइफ से डेढ़ गुणा ज्यादा चल चुकी है. इन्हें आस्ट्रेलियन कंपनी ने जर्मनी से मंगाया था. ऐसी मशीनें देश में दूसरी जगह कहीं नहीं है. इन मशीनों के उपयोग के लिए कुछ खास शर्तें हैं. लेकिन देश में पिपरवार परियोजना जैसी शर्तें उपलब्ध कराने में कोई दूसरा खदान सक्षम नहीं है. इस वजह से इन मशीनों का स्क्रैप में भेजना ही बेहतर होगा.
संजीव कुमार, जीएम.
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