ओरांव जनजातीय परंपरा पर फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने कहा - भतीजी के पति को 'घर-दामाद' के तौर पर नहीं अपना सकते

सुप्रीम कोर्ट ने ओरांव आदिवासी समुदाय की पारंपरिक विरासत प्रथाओं पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मान्यता प्राप्त पारंपरिक कानून के तहत कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर-दामाद' के तौर पर शामिल नहीं कर सकता. यह फैसला पैतृक संपत्ति से जुड़े एक जटिल विवाद का निपटारा करता है.

Supreme Court Oraon Tribal Inheritance : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ओरांव आदिवासी समुदाय में विरासत से जुड़ी पारंपरिक प्रथाओं के मामले में एक अहम फैसले में कहा कि मान्यता प्राप्त पारंपरिक कानून के तहत कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर-दामाद' (घर में रहने वाला दामाद) के तौर पर शामिल नहीं कर सकता. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि प्रचलित पारंपरिक कानून में ऐसी कोई बात साबित नहीं हुई है कि कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को अपना घर-दामाद बना सके.

पैतृक संपत्ति पर शुरू हुआ विवाद 

बेंच ने ट्रायल कोर्ट, पहली अपीलीय अदालत और झारखंड हाइकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें चाचा-ससुर द्वारा घर-दामाद रखने की व्यवस्था को सही ठहराया गया था. यह विवाद सुखू ओरांव की पुश्तैनी संपत्ति को लेकर शुरू हुआ, जिनके तीन बेटे हैं - घुंगरू, लेदुरा और भौला. लेदुरा की मौत बिना किसी संतान के हो गयी, जबकि भौला की मौत के समय उनकी एक बेटी बुधैन है. वादी बेजला ओरांव (धुंगरू का बेटा) ने दावा किया कि सबसे करीबी पुरुष रिश्तेदार होने के नाते, लेदुरा और भौला की मौत के बाद संपत्ति उसे विरासत में मिली. वहीं, प्रतिवादियों का तर्क था कि बुधैन के पति पुनाई को लेदुरा ने घर-दामाद के तौर पर रखा था.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला 

अपीलकर्ता-वादी के तर्क में दम पाते हुए जस्टिस करोल के फैसले में कहा गया कि प्रतिवादी यह साबित करने में विफल रहे कि कथित "घर-दामाद" व्यवस्था लागू रीति-रिवाज की शर्तों को पूरा करती थी.

ट्रायल कोर्ट के फैसले 

ट्रायल कोर्ट ने घर-दामाद वाली व्यवस्था की वैधता के बारे में प्रतिवादियों की दलील को मानते हुए मुकदमा खारिज कर दिया. पहली अपीलीय अदालत ने इस फैसले को बरकरार रखा, जबकि झारखंड हाइकोर्ट ने दूसरी अपील भी खारिज की. हालांकि उसने कानून का एक अहम सवाल तय किया था कि क्या ओरांव पारंपरिक कानून के तहत चाचा-ससुर को घर-दामाद रखने का अधिकार है. इसके बाद वादी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

वादी ने दिया तर्क 

सुप्रीम कोर्ट के सामने वादी ने तर्क दिया कि निचली अदालतों ने गलत फैसला सुनाया है, क्योंकि रिकॉर्ड में ऐसी कोई पारंपरिक प्रथा नहीं है, जो चाचा-ससुर द्वारा घर-दामाद रखने की व्यवस्था को मंजूरी देती हो. लेडुरा और भौला की मृत्यु के बाद संपत्ति का उत्तराधिकार पाने का हकदार केवल सबसे करीबी पुरुष रिश्तेदार यानी वे खुद ही हैं.

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By Priya Gupta

प्रिया गुप्ता प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. फिलहाल वह झारखंड से जुड़ी खबरों पर काम करती हैं, जिनमें सरकारी योजनाएं, प्रमुख घटनाएं, सामाजिक मुद्दे और अन्य महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं. इससे पहले वह लाइफस्टाइल डेस्क पर फैशन, हेल्थ, रिलेशनशिप, पैरेंटिंग और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर लेख लिख चुकी हैं. प्रिया ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से स्नातक और अमिटी यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री हासिल की है.

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