रांची से राजकुमार लाल की रिपोर्ट
Ranchi News: झारखंड की राजधानी रांची में शुक्रवार को महाकवि विद्यापति याद किए गए है. झारखंड मैथिली मंच की ओर से विद्यापति जयंती के मौके पर तीन दिवसीय महाकवि स्मृति पर्व का आयोजन किया गया है. इस मौके पर मैथिली मंच के सदस्यों ने सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा को जीवंत रखते हुए एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया. कार्यक्रम की शुरुआत विद्यापति दलान, हरमू से पैदल मार्च के साथ हुई, जो मेन रोड स्थित महाकवि विद्यापति की प्रतिमा तक पहुंची. वहां सभी सदस्यों ने सामूहिक रूप से माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.
दीप प्रज्वलन के साथ हुआ उद्घाटन सत्र
कार्यक्रम का आयोजन विद्यापति दलान में तीन सत्रों (उद्घाटन सत्र, साहित्यिक परिचर्चा और कवि गोष्ठी) में किया गया. उद्घाटन सत्र की शुरुआत दीप प्रज्वलन और विद्यापति के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर हुई. इस अवसर पर विद्या नाथ झा विदित, डॉ. परवेज हसन, प्रमोद कुमार झा सहित अन्य अतिथियों के साथ मंच के अध्यक्ष बिनय कुमार झा, महासचिव जयंत कुमार झा और अरुण कुमार झा उपस्थित रहे.
मंगल मंत्र और भक्ति संगीत से बना आध्यात्मिक माहौल
पंडित शतीस कुमार मिश्र ने मंगल मंत्र स्वस्ति वाचन और शंख ध्वनि के साथ पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया. इसके बाद मिथिला परंपरा के अनुसार भगवती वंदना “जय जय भैरवि असुर भयाउनि” तथा राष्ट्रगान “जन गण मन” का सामूहिक गायन किया गया. अतिथियों का स्वागत पारंपरिक पाग-दोपटा देकर किया गया, जिससे कार्यक्रम में सांस्कृतिक गरिमा झलक उठी.
परिचर्चा में उभरे नारी शक्ति और मिथिला संस्कृति के आयाम
साहित्यिक परिचर्चा सत्र में वक्ताओं ने मिथिला संस्कृति, नारी शक्ति और साहित्य पर गहन विचार साझा किए. बोकारो से आई शैलजा झा ने नारी शक्ति के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला, वहीं शंभूनाथ झा ने मैथिली नाट्य कला की समृद्ध परंपरा को रेखांकित किया. प्रमोद कुमार झा और डॉ. नरेंद्र झा ने माता सीता के व्यक्तित्व, उनके गुणों और उनके जीवन के प्रेरणादायक पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की.
इतिहास और परंपरा पर आधारित विचारों की प्रस्तुति
हितनाथ झा ने कालिदास और मिथिला के ऐतिहासिक संबंधों के साथ-साथ मैथिली भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रामाणिक तथ्यों को सामने रखा. विद्या नाथ झा विदित ने अपने उद्बोधन में माता जानकी के प्राकट्य, उनके आध्यात्मिक महत्व और मिथिला की वैश्विक सांस्कृतिक गरिमा पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने बताया कि बैशाख महीने में माता जानकी का प्रकट होना धार्मिक और पुराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है.
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कवि गोष्ठी के साथ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम का अंतिम सत्र कवि गोष्ठी के रूप में आयोजित हुआ, जिसमें कई कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मिथिला की संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों को प्रस्तुत किया. इस आयोजन ने न केवल साहित्य प्रेमियों को एक मंच प्रदान किया, बल्कि मैथिली भाषा और संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
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