फिलहाल मां के पास ही रहेगी साढ़े चार साल की बेटी, झारखंड हाईकोर्ट ने दिया आदेश

झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें बच्ची की कस्टडी मां को देने से इनकार किया गया था. अदालत ने माना कि बच्ची की भलाई सर्वोच्च प्राथमिकता है.


Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हजारीबाग फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें करीब साढ़े चार साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को देने से इनकार किया गया था. कोर्ट ने कहा कि बच्ची की भलाई सर्वोच्च प्राथमिकता है और मुख्य अभिभावकता मामले के अंतिम फैसले तक अंतरिम कस्टडी मां को सौंपी जाएगी.

फैमिली कोर्ट का आदेश पलटा

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने फर्स्ट अपील संख्या 335/2026 पर सुनवाई करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट ने अंतरिम कस्टडी की मूल मांग पर विचार करने के बजाय केवल मुलाकात के अधिकार पर फैसला दिया, जो कानून के अनुरूप नहीं था. हाईकोर्ट ने इसे आदेश में गंभीर त्रुटि बताते हुए निरस्त कर दिया.

दोनों विवि में सहायक प्राध्यापक

मामले के अनुसार, डॉ संगीता विश्वकर्मा और राहुल रंजन दोनों विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में सहायक प्राध्यापक हैं. दोनों की शादी 16 मई 2017 को हुई थी और 8 मार्च 2022 को आईवीएफ प्रक्रिया के जरिए बेटी एकांशी शर्मा का जन्म हुआ. बाद में वैवाहिक विवाद बढ़ने पर बच्ची की कस्टडी को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हुई. मां ने आरोप लगाया कि पति ने बच्ची को अपने पास रखकर मिलने तक से रोक दिया, जबकि पिता ने इन आरोपों से इनकार किया.

बच्ची का हित सबसे महत्वपूर्ण

हाईकोर्ट ने कहा कि अभिभावकता से जुड़े मामलों में माता-पिता के अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का हित सर्वोपरि होता है. अदालत ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(ए) और 13 तथा गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 का हवाला देते हुए कहा कि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः मां के पास होनी चाहिए, जब तक इसके विपरीत कोई मजबूत कारण न हो.

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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई अहम निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि छोटे बच्चों को दोनों माता-पिता के स्नेह की जरूरत होती है, लेकिन अंतरिम कस्टडी तय करते समय अदालत को बच्चे की मानसिक, शारीरिक, नैतिक और भावनात्मक भलाई को प्राथमिकता देनी होती है. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि स्थायी कस्टडी का मुकदमा अभी फैमिली कोर्ट में लंबित रहेगा, लेकिन अंतिम निर्णय आने तक बच्ची मां की अंतरिम कस्टडी में रहेगी, जबकि पिता को मुलाकात का अधिकार मिलेगा.

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By Rana pratap

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