क्या झारखंड में छात्रों का आंदोलन पड़ने लगा धीमा? संख्या कम होने से फुटपाथ दुकानदारों की घटने लगी कमाई

रांची में JPSC समेत विभिन्न मांगों को लेकर चल रहा छात्रों का आंदोलन अब धीमा पड़ रहा है, जिसका सीधा असर जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम के आसपास के फुटपाथ दुकानदारों पर पड़ा है. एक समय जहां आंदोलनकारियों की भीड़ से इनकी कमाई रिकॉर्ड तोड़ रही थी, वहीं अब संख्या घटने से बिक्री में भारी गिरावट आई है.


रांची से नवीन शर्मा की रिपोर्ट

JPSC Student Protest: झारखंड में JPSC समेत विभिन्न मांगों को लेकर पिछले 19 दिनों से चल रहा छात्रों का आंदोलन अब धीरे-धीरे धीमा पड़ता दिखाई दे रहा है. 10 अगस्त को विधानसभा घेराव के बाद जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जुटे छात्रों की संख्या में लगातार कमी आती दिखाई दे रही है. आंदोलन में शामिल आधे से अधिक छात्र अपने घर लौट चुके हैं. हालांकि, संख्या घटने के बावजूद आंदोलन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और छात्र अब भी अपनी मांगों को लेकर स्टेडियम में डटे हुए हैं.

फुटपाथ दुकानदारों की कमाई प्रभावित


छात्र आंदोलन की भीड़ कम होने का असर सिर्फ प्रदर्शन स्थल पर ही नहीं, बल्कि स्टेडियम के आसपास रोजी-रोटी चलाने वाले फुटपाथ दुकानदारों पर भी दिखाई देने लगा है. आंदोलन के दौरान जहां इन दुकानदारों के लिए स्टेडियम के आसपास का इलाका अचानक बड़े बाजार में बदल गया था, वहीं अब भीड़ कम होने के साथ उनकी बिक्री भी काफी घट गयी है. इंसानों के आंदोलन का भी अपना अर्थशास्त्र होता है, यह बात शायद इन चाय के कपों ने सबसे साफ समझी.

आंदोलन के दौरान दुकानदारों की रिकॉर्ड कमाई


पिछले करीब 10 दिनों में जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम के आसपास दुकान लगाने वाले फुटपाथ दुकानदारों ने जमकर कमाई की. चाय, नाश्ता, फास्ट फूड, चाट-गुपचुप, फल और जूस बेचने वाले दुकानदारों के लिए आंदोलन के दौरान ग्राहकों की संख्या अचानक कई गुना बढ़ गयी थी. कई दुकानदारों का कहना है कि आंदोलन के दौरान जितनी कमाई हुई, उतनी उन्होंने वर्षों की दुकानदारी में भी नहीं की थी. बड़ी संख्या में छात्रों के लगातार स्टेडियम में रहने के कारण सुबह से लेकर देर रात तक दुकानों पर भीड़ बनी रहती थी. एक फल विक्रेता ने बताया कि वह करीब 40 साल से दुकान लगा रहे हैं, लेकिन इतने लंबे समय में कभी एक साथ इतनी कमाई नहीं हुई, जितनी आंदोलन के पिछले 10 दिनों में हुई. उनके मुताबिक, आंदोलन के कारण रोजाना ग्राहकों की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़ गयी थी.

10 साल की दुकानदारी में पहली बार दिखी ऐसी बिक्री


स्टेडियम के आसपास चाय बेचने वाले दुकानदारों के लिए भी आंदोलन किसी बड़े कारोबारी सीजन से कम नहीं रहा. एक चाय दुकानदार ने बताया कि वह करीब 10 साल से दुकान चला रहे हैं, लेकिन पिछले 10 दिनों जैसी बिक्री उन्होंने पहले कभी नहीं देखी. छात्रों की बड़ी संख्या के कारण चाय और नाश्ते की मांग लगातार बनी रही. आंदोलन स्थल पर मौजूद छात्रों, उनके साथ पहुंचे लोगों और अन्य लोगों के कारण छोटी-छोटी दुकानों पर भी ग्राहकों की कतार दिखाई देती थी.

एक दिन में बिकती थी दो हजार से ज्यादा कप चाय


आंदोलन के दौरान चाय की दुकानों पर सबसे ज्यादा भीड़ देखी गयी. दुकानदारों के अनुसार, सामान्य दिनों में जहां चाय की बिक्री सीमित रहती है, वहीं आंदोलन के दौरान कई दुकानदार एक दिन में 2 हजार से ज्यादा कप चाय तक बेच रहे थे. सुबह आंदोलन शुरू होने से पहले से ही चाय की मांग शुरू हो जाती थी. दिनभर छात्रों के बीच चाय और नाश्ते का सिलसिला चलता रहता था. देर शाम तक भी दुकानों पर ग्राहकों की मौजूदगी बनी रहती थी. अब तस्वीर बदल गयी है. छात्रों की संख्या घटने के बाद दुकानदारों का कहना है कि 100 कप चाय बेचना भी मुश्किल हो गया है. यानी कुछ दिनों पहले जहां चाय के कप लगातार निकल रहे थे, अब उसी जगह दुकानदार ग्राहकों का इंतजार करते दिखाई दे रहे हैं.

फल और जूस वालों को भी लगा झटका


आंदोलन के दौरान केवल चाय और नाश्ते की दुकानों की बिक्री नहीं बढ़ी थी. फल और जूस बेचने वाले दुकानदारों को भी इसका फायदा मिला. बड़ी संख्या में छात्र स्टेडियम में मौजूद थे और लंबे समय तक आंदोलन स्थल पर रहने के कारण खाने-पीने की चीजों की मांग बनी हुई थी. दुकानदारों के मुताबिक, आंदोलन के शुरुआती दिनों में ग्राहकों की संख्या इतनी अधिक थी कि सामान खत्म होने पर उन्हें कई बार दोबारा माल मंगाना पड़ता था. अब छात्रों की संख्या घटने के साथ मांग भी कम हो गयी है.

दुकानदार बोले, कमाई अपनी जगह, छात्र घर लौटें


आंदोलन से आर्थिक फायदा होने के बावजूद दुकानदार छात्रों के आंदोलन के लंबे समय तक जारी रहने के पक्ष में नहीं हैं. जब उनसे पूछा गया कि यदि आंदोलन चलता रहेगा तो उनकी दुकानदारी भी चलती रहेगी, क्या वे चाहते हैं कि प्रदर्शन इसी तरह जारी रहे, तो उनका जवाब कारोबार से अलग था. दुकानदारों ने कहा कि कमाई अपनी जगह है, लेकिन वे चाहते हैं कि छात्रों की मांगें पूरी हों और आंदोलन खत्म हो. छात्रों को अपने घर लौटना चाहिए और शहर में सामान्य स्थिति बहाल होनी चाहिए. यानी जिन छात्रों की मौजूदगी से पिछले 10 दिनों में दुकानदारों की कमाई बढ़ी, उन्हीं छात्रों के जल्द घर लौटने की इच्छा भी दुकानदार जता रहे हैं. रोजमर्रा की जिंदगी का हिसाब-किताब शायद मुनाफे से थोड़ा ज्यादा जटिल होता है.

भीड़ घटी तो बिक्री भी घटी


छात्र आंदोलन की भीड़ ने जहां अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाया, वहीं इस दौरान आसपास के छोटे दुकानदारों को भी अप्रत्याशित आर्थिक फायदा मिला. अब भीड़ कम हुई है तो बिक्री भी घट गयी है. आंदोलन की राजनीति अपनी जगह है, लेकिन स्टेडियम के बाहर चाय की दुकान पर इसका सबसे सीधा हिसाब शायद अब भी वही है, 2 हजार कप से 100 कप तक.

छात्रों की संख्या कम, लेकिन आंदोलन खत्म नहीं


जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में छात्रों की संख्या में कमी जरूर आयी है, लेकिन आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. छात्र अपनी मांगों को लेकर अब भी डटे हुए हैं. आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में छात्र राज्य के अलग-अलग जिलों से रांची पहुंचे थे. 10 अगस्त को विधानसभा घेराव के बाद आंदोलन का स्वरूप बदला है और अब स्टेडियम में पहले की तुलना में कम छात्र मौजूद हैं. आधे से अधिक छात्रों के घर लौटने के बावजूद आंदोलन से जुड़े छात्र अपनी मांगों पर कायम हैं.

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सरकार-छात्र की सहमति पर टिकी सबकी नजरें

अब आंदोलन का अगला चरण सरकार और छात्रों के बीच बातचीत और संभावित सहमति पर निर्भर करेगा. यदि छात्रों की मांगों को लेकर कोई ठोस समाधान निकलता है, तो आंदोलन समाप्त होने की संभावना बढ़ेगी. वहीं, यदि बातचीत बेनतीजा रहती है, तो कम हुई भीड़ के बावजूद आंदोलन दोबारा तेज हो सकता है. फिलहाल स्टेडियम में छात्रों की संख्या कम होने के साथ आसपास की सड़क किनारे दुकानों की रौनक भी फीकी पड़ गयी है. जिन दुकानदारों के लिए पिछले करीब 10 दिन असाधारण कमाई लेकर आये थे, उनके लिए अब कारोबार फिर सामान्य दिनों की पटरी पर लौटता दिख रहा है.

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लेखक के बारे में

By कुमार विश्वत सेन

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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