आम के मंजरों को जला दे रही हैं कोयले की उड़ती धूल

ट्रांस्पोर्टिंग और डकरा रैक साइडिंग से उड़ती धूल चुरी-होयर राजस्व ग्राम के किसानों के लिए अभिशाप बनती जा रही है.

खलारी. खलारी प्रखंड के होयर गांव में कोयले की उड़ती धूल अब केवल प्रदूषण का कारण नहीं, बल्कि किसानों की सालों की तपस्या को निगलने वाला भस्मासुर बन गयी है. ट्रांस्पोर्टिंग और डकरा रैक साइडिंग से उड़ती धूल चुरी-होयर राजस्व ग्राम के किसानों के लिए अभिशाप बनती जा रही है. ऐसे में मनरेगा और अपनी जमा-पूंजी से तैयार किये गये आम के बगीचे आज कोयले की कालिख से सराबोर हैं. जिस मंजर (फूल) से इस बार बंपर पैदावार की उम्मीद थी, धूल की मोटी परत ने उन्हें समय से पहले ही झुलसाना शुरू कर दिया है. इस कारण होयर गांव के किसानों को चेहरे पर मायूसी छा गयी है.

किसानों की सालों की मेहनत पर कोयले का प्रहार

होयर गांव के किसान टेकनारायण यादव बताते हैं कि उनके भाई उमेश यादव वर्ष 2021 में मनरेगा योजना के तहत अपनी 70 डिसमिल जमीन पर कुल 50 आम के पौधे लगा कर खुशहाली का सपना बुना था. उन्होंने इसमें कई उन्नत नस्ल के पौधे खुद खरीद कर लगाये और दिन-रात मेहनत कर उन्हें सींचा. लेकिन आज उनकी आंखों के सामने यह मेहनत धूल चाट रही है. यादव बताते हैं, अगर एक दिन भी पानी की फुहारों से पत्तों को न धोया जाए तो मंजरों पर कोयले की ऐसी परत बैठ जाती है कि फूल काले पड़कर गिरने लगते हैं.

किसानों की आम प्रदर्शनी का सपना हुआ धुंधला

किसानों ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि वे अपने बागान के आमों को प्रखंड स्तरीय प्रदर्शनी में ले जाने का सपना देखते थे, लेकिन मौजूदा प्रदूषण में फलों का पुष्ट होना ही मुश्किल हो गया है. होयर गांव के मनोज कुमार, उमेश यादव, सुरेश यादव, अमित यादव और सत्यनारायण यादव ने बड़े चाव से बागवानी शुरू की थी, पर आज उनकी मेहनत और उम्मीदें इस कोयले की काली धूल में दफन होती दिख रही हैं.

क्या कह रहे हैं ग्राम होयर के किसान

किसान मनोज कुमार

ने बताया कि सालों तक बच्चों की तरह इन पौधों को पाला, अब जब फल देने का समय आया तो कोयले की धूल ने इन्हें घेर लिया. मंजरों पर परागण नहीं हो पा रहा है, जिससे फल टिक नहीं पा रहे.

किसान उमेश यादव

ने बताया कि लाखों की लागत और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर हमने आम बागवानी स्वरोजगार चुना था, लेकिन सड़क से उड़ती यह धूल हमारे भविष्य को अंधकारमय बना रही है. प्रशासन मुआवजा दे या ट्रकों का रास्ता बदले.

किसान सत्यनारायण यादव

ने बताया कि कोयले की कालिख इतनी जिद्दी है कि कीटनाशकों का छिड़काव भी बेअसर साबित हो रहा है. आम के पत्तों के छिद्र बंद होने से पेड़ों का विकास रुक गया है और वे समय से पहले ही बूढ़े दिखने लगे हैं.

किसान सुरेश यादव

ने बताया की आम की बागवानी हमारी आजीविका का मुख्य जरिया बननेवाली थी. लेकिन जिस तरह से काली धूल मंजरों को जला रही है, हमें डर है कि इस बार लागत निकालना भी मुश्किल होगा.

स्लग ::::होयर में आम की बागवानी करनेवाले किसानों के अरमानों पर फिरा पानी

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By DINESH PANDEY

DINESH PANDEY is a contributor at Prabhat Khabar.

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