मनोज सिंह, रांची. झारखंड के अनुसूचित जनजाति (एसटी) समाज के 94% अभिभावकों का सपना बच्चों को उच्च और तकनीकी शिक्षा दिलाना है. वहीं मात्र 06% अभिभावक ही बच्चों को केवल प्राथमिक शिक्षा तक सीमित रखना चाहते हैं. इसका खुलासा हाल में जारी ””अनुसूचित जनजाति मानव विकास रिपोर्ट-2025”” में किया गया है. यह रिपोर्ट झारखंड के जनजातीय समाज की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति पर प्रकाश डालती है. इसे इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट, नयी दिल्ली ने तैयार किया है. इस सूची में सबसे खराब स्थिति मध्य प्रदेश की है और सबसे अच्छी स्थिति में सिक्किम है.
झारखंड के सामने बड़ी चुनौती बरकरार
रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल झारखंड के सामने बड़ी चुनौती बरकरार है. झारखंड एसटी बहुल राज्यों की सूची में फिलहाल नीचे से चौथे स्थान पर है. जिससे पता चलता है कि झारखंड आज अपने मूल निवासियों अनुसूचित जनजातियों के सर्वांगीण विकास के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में एसटी समुदाय का उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात 13.7% दर्ज किया गया है. लेकिन जमीनी चुनौतियां अभी भी कायम हैं. माध्यमिक स्तर पर स्कूलों की दूरी एक बड़ी बाधा है. रिपोर्ट बताती है कि जहां गैर-जनजातीय परिवारों के पास दो किमी के भीतर स्कूल की सुविधा अधिक है, वहीं कई जनजातीय छात्रों को स्कूल पहुंचने के लिए पांच किमी से अधिक की दूरी तय करनी पड़ती है.
एसटी समुदाय में कम हुई नवजात मृत्यु की दर
स्वास्थ्य के मोर्चे पर झारखंड ने मिश्रित परिणाम दिखाये हैं. रिपोर्ट के आंकड़ों (2019-21) के अनुसार, झारखंड में अनुसूचित जनजातियों के बीच नवजात मृत्यु की दर प्रति हजार 31.3 है, जो 2015-16 के 32.8 के मुकाबले बेहतर हुई है. इसी तरह एसटी महिलाओं में कुपोषण की दर पहले 35.0% थी, वह अब घटकर 28.0 % रह गयी है. हालांकि जनजातीय क्षेत्रों में उप-केंद्रों और डॉक्टरों की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है, जिसे दूर करने के लिए रिपोर्ट में ”राज्य जनजातीय स्वास्थ्य कार्य योजना” बनाने का सुझाव दिया गया है. झारखंड के जनजातीय परिवारों की आर्थिक स्थिति पिछले दशक में सुधरी है. लगभग 38 % लोगों के घरों की आर्थिक स्थिति पिछले 10 वर्षों में बेहतर हुई है.
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