रांची : हिंदी के प्रख्यात आलोचक, साहित्यकार और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मंडल के सदस्य व गोड्डा निवासी डॉ खगेंद्र ठाकुर ने 83 वर्ष की अवस्था में पटना में अंतिम सांस ली.
साहित्य के साथ-साथ इन्होंने राजनीति में भी अपनी अलग पहचान बनायी. इनके निधन पर शोक की लहर दौड़ गयी. साहित्य के क्षेत्र से जुड़े लोगों ने डॉ ठाकुर का असमय चला जाना समूचे प्रगतिशील आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति बताया है.
इन्होंने झारखंड प्रलेस के लिए यह काफी दुखदायी खबर बताया. झारखंड आने के बाद ही राज्य कमिटी गठित हुई थी, जिसके वे संस्थापक अध्यक्ष रहे. यहां उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण लेखकों को संगठन से जोड़ा और प्रलेस को नयी ऊंचाई तक ले गये. उनके लेखन का दायरा काफी विस्तृत है. उन्होंने आलोचना के साथ साथ व्यंग्य, कविता और उपन्यास भी लिखा. उत्तरशती जैसी साहित्यिक पत्रिका का संपादन किया और जनशक्ति जैसे अखबार का भी लंबे समय तक संपादन किया. इनका वैचारिक लेखन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है.
मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के गहरे अध्येता : डॉ ठाकुर के निधन पर झारखंड प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से अध्यक्ष जयनंदन, महासचिव मिथिलेश, कथाकार रणेंद्र, पंकज मित्र, कवि महादेव टोप्पो, प्रवीण परिमल, सूरज श्रीवास्तव, इप्टा के राज्य महासचिव उपेंद्र मिश्र, विभूति नारायण राय, मधु तलवार, विनीत तिवारी, राकेश, अली जावेद ने शोक व्यक्त किया है. इन्होंने साहित्य के क्षेत्र में अपूरणीय क्षति बताया है. साथ ही मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के गहरे जानकार अौर अध्येता बताया.
स्मृति शेष : एक प्रगतिशील योद्धा का अवसान
डॉ मिथिलेश
दो पहर एक खबर मिली कि पता कीजिए खगेंद्र जी के बारे में कि वे नहीं रहे. इस खबर के झूठ होने की कामना के साथ कुछ साथियों से बात की, पर दुर्भाग्य से यह खबर सच थी. खगेंद्र ठाकुर का नहीं रहना प्रगतिशील आंदोलन के लिए एक बड़ा नुकसान तो है ही, झारखंड-बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के लिए यह कभी भरपाई न हो सकनेवाली क्षति है.
खगेंद्र को याद करें, तो किस रूप में. हिंदी के अालोचक, कवि, व्यंग्य लेखक, संपादक, संगठनकर्ता, शिक्षक आंदोलनकारी, भाकपा नेता या फिर एक विचारधारा की मशाल थामे अग्रिम पंक्ति में चलनेवाले प्रगतिशील योद्धा के रूप में. हर रूप में उनकी सक्रियता लगभग समान रही अौर बहुत हद तक युवाअों को भी ईर्ष्यालु बनानेवाली. प्रलेस की बिहार राज्य इकाई के महासचिव के साथ-साथ राष्ट्रीय महासचिव का दायित्व जब उन्हें सौंपा गया, तो उन्होंने बखूबी उसका निर्वाह किया. शहर हो या गांव, जहां भी जरूरत पड़ी वे समय पर साधन-संसाधन की परवाह किये बगैर पहुंचते रहे.
यात्रा क्रम में भी लेखन कार्य बदस्तूर जारी रहा. कहानी, कविता, उपन्यास सब पर उनकी आलोचकीय दृष्टि पड़ी अौर नये से नये लेखकों का लेखन भी उनसे अछूता न रहा. मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र की जितनी गहरी अौर स्पष्ट समझ खगेंद्र जी में दिखी वह आज विरल है. फोन या फिर आमने-सामने जब भी बात होती, तो उनका पहला सवाल होता क्या नया पढ़ लिख रहे हो आदि. अब सवाल पूछनेवाले खगेंद्र जी हम सबों के बीच नहीं रहे.
(लेखक, प्रगतिशील लेखक संघ झारखंड के महासचिव हैं.)
निधन पर वाम विचारकों ने जताया दुख
खगेंद्र जी ने साहित्य के क्षेत्र में जो योगदान दिया है, उसे भुलाया नहीं जा सकता है. वह इप्टा से भी जुड़े रहे. संगठन के अभिभावक के तौर पर एक बड़ा हिस्सा कट गया. उनका ऐसे समय में जाना साहित्य क्षेत्र को एक बड़ा चोट है.
वह अपने सामने वाले को कभी यह एहसास नहीं होने देते थे कि वह उससे ज्यादा जानकार हैं. कभी उनसे बात कर के नहीं लगा कि वो सामने वाले को कम समझते थे. लिखने वालों को उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला है. वह गोड्डा में प्रोफेसर थे. पर नौकरी छोड़ उन्होंने साहित्य और सांस्कृतिक क्षेत्र में योगदान दिया. कम्युनिष्ट पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में थे, पर उन्होंने हमेशा साहित्य पर जोर दिया. उनके जाने से साहित्य जगत में बहुत बड़ी क्षति हुई है.
उपेंद्र मिश्रा, राज्य महासचिव, इप्टा
असहमतियों के बावजूद भी, वह लोगों को सम्मान और स्थान देना जानते थे. वह बेहद सरल स्वभाव के थे. छात्र आंदोलन के दौर से ही उनसे मेरा परिचय रहा था. सफदर हाशमी की हत्या के वक्त नुक्कड़ नाटक के दौरान एक महीने तक उनके साथ रहने और उन्हें करीब से समझने का अवसर प्राप्त हुआ था. उनका निधन हिंदी जगत और हमारे समाज के लिए अपूरणीय क्षति है.
प्रकाश विप्लव, सचिव मंडल सदस्य, मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी (माकपा)
उनके इस तरह जाने से कम्युनिष्ट पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ है. वह झारखंड में राज्य कार्यकारिणी के मेंबर भी थे. वह ऑल इंडिया प्रगतिशील लेखक संघ के विभिन्न पदों पर रहे. हिंदी साहित्य में नये प्रतिमान स्थापित करने वाले शीर्षस्थ खगेंद्र ठाकुर के निधन से गहरा दुःख हुआ. उनका जाना केवल हिंदी ही नहीं, अपितु साहित्य के लिए एक बहुत बड़ा आघात है.
भुवनेश्वर प्रसाद मेहता, राज्य सचिव, भाकपा
वामपंथ विचारों ने अपनी एक ताकतवर आवाज खो दी है. समाज को सहिष्णु, जनतांत्रिक बनाने में उन्होंने जिंदगी लगा दी. उनके विचारों और संवाद को बहाल करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी. वह एकीकृत बिहार में सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर बौद्धिक एक्टिविस्ट के साथ ही सांस्कृतिक साहित्य को जमीनी तौर पर जोड़ने वाले मार्गदर्शक भी रहे. आज के जटिल दौर में जसम के लिए बड़ी क्षति है.
अनिल अंशुमन, झारखंड जनसंस्कृति मंच, झारखंड प्रभारी
